ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चलते-चलते. . . .
(टीम खोज-विचार की पहेल)
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चलते–चलते . . . .
(टीम खोज–विचार की पहेल)
प्रकाश पर्व विशेष: बाबा श्री चंद जी
‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ और माता सुलखनी जी के ज्येष्ठ सुपुत्र बाबा श्री चंद मुनि जी का आविर्भाव संवत सन् 1551 भाद्रपद शुक्ला नवमी एवं संवत सन् 1700 शुक्ला पंचमी अर्थात् आप जी का प्रकाश 8 सितंबर सन् 1494 ई. एवं अकाल चलाना (ज्योति–ज्योत) सन् 1629 ई. को हुआ था। आप जी ने उदासीन संप्रदाय की स्थापना की थी एवं उदासीन संप्रदाय के आप मुख्य प्रवर्तक माने जाते हैं। आप जी का प्रकाश कपूरथला जिले के सुल्तानपुर लोधी नामक स्थान पर हुआ था। आप जी के प्रकाश के समय से ही शरीर पर एक पतली विभूती की परत एवं कानों में मांस के कुंडल प्राकृतिक रूप से ही बने हुए थे।
बाबा श्री चंद जी को कलयुग में शिव का अवतार माना जाता है। बाबा श्री चंद जी बाल्यावस्था से ही घने ग़िरफ्तारलों में एकांतवास लेकर समाधि लगा लेते थे। आप जी ने ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ के चरण चिन्हों पर चलते हुए पूरे देश का भ्रमण किया था एवं एक अकाल पुरख की वाणी का प्रचार–प्रसार किया था। अपने देशाटन में अनेक तीर्थों के आपने दर्शन किए एवं अनेक साधु–संत और महापुरुषों को उदासीन संप्रदाय के माध्यम से एक सूत्र में जोड़ने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया था। आप जी ने अपनी वाणी और प्राप्त अलौकिक शक्तियों के माध्यम से अनेक दीन–दुखियों के कष्टों का निवारण किया था।
बाबा श्री चंद जी महान कर्मयोगी और उत्तम साधक थे। बाबा जी सदैव ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की वाणी के प्रति समर्पित रहे थे। आप जी अपनी योग शक्ति से अपनी संपूर्ण उम्र में युवावस्था में ही बने रहे थे। जब आप जी का अंतर्ध्यान 13 जनवरी सन् 1629 ई. को हुआ तो उस समय 135 वर्ष की आयु में भी आप अपनी योग शक्ति के माध्यम से सदैव युवावस्था में ही बने हुए थे। आप जी का सिख गुरुओं से अत्यंत निकट का संबंध था। उस समय देश के समस्त उदासीन मठों का खर्चा भी गुरु घरों से ही चलता था। ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की चौथी पावन–पुनीत ज्योत, ‘श्री गुरु रामदास साहिब जी’ से जब आपकी मुलाकात हुई तो उस समय गुरु ‘श्री रामदास साहिब जी’ की आयु 45 वर्ष की थी एवं बाबा श्री चंद जी की आयु 104 वर्ष की थी। उस समय प्रसन्न मुद्रा में बाबा श्री चंद जी ने गुरु पातशाह जी से पूछा कि आपने इतना लंबा दाढ़ा (दाढ़ी) क्यों रखा हुआ है? उस समय ‘श्री गुरु रामदास पातशाह जी’ ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया था कि मैंने यह दाढ़ा (लंबी दाढ़ी के बाल) आपके चरणों को स्वच्छ करने हेतु रखा हुआ है और जैसे ही ‘श्री गुरु रामदास साहिब जी’ आगे बढ़े तो बाबा श्री चंद जी ने अपने चरणों को पीछे कर लिया था। बाबा श्री चंद जी, ‘श्री गुरु रामदास साहिब जी’ की विनम्रता से अत्यंत प्रभावित हुए थे और उस समय वचन किए कि तुम्हारी महिमा बहुत अधिक है। तुम जैसे गुरु का आशीर्वाद लेकर तो मुझ जैसा पापी भी मुक्त हो जायेगा।
बाबा श्री चंद जी को उदासियों के स्वामी के नाम से संबोधित किया जाता है। उदास शब्द का अर्थ स्वयं से आस और किसी से कोई आशा नहीं होना है। दूसरों से निराश और स्वयं से रखे जो आस अर्थात् वह उदास! अर्थात जो अपने में लीन रहने वाले हो, उदासिन अर्थात अपने आप में आसन लगाना। जन्म से बैरागी, निराश और उदास! यानी कि जो व्यक्ति दुनियादारी से उदास हो चुका है, जिसे बाहरी दुनिया और लोक दिखावे निरर्थक लगने लगे, ऐसे लोगों के स्वामी के रूप में बाबा श्री चंद जी को निरूपित किया गया है। ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ ने भी अपने जीवन में चार उदासी यात्राओं को लोक कल्याण और परोपकार के लिए किया था। बाबा श्री चंद जी भी आम लोगों को उपदेशित कर वचन करते थे कि संसार के सभी पदार्थ झूठे हैं, संसार का मोह दुखों का घर है। माया नागिन स्वरूप है, इसके डंक से बचना मुश्किल है। उन्होंने पूरे संसार को ही अपना घर मानकर लोक कल्याण हेतु देशाटन किया था। आप जी ने धर्म की कमाई, सच बोलना और सेवा–सिमरन के उपदेश प्रेषित किए थे। आप जी जब भी घने ग़िरफ्तारलों में समाधि लगाते थे तो खतरनाक ग़िरफ्तारली जानवर और ज़हरीले सांप आप जी के इर्द गिर्द विचरण करते रहते थे।
बाबा श्री चंद जी का बाल तेग बहादुर साहिब जी (जो कि भविष्य में सिख धर्म के नौवें गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ के रूप में मनोनीत हुए थे) के साथ भी बहुत ही निकट का और स्नेह का संबंध था। बाबा श्री चंद जी से ही प्रभावित होकर बाल्यावस्था में ही ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ वैराग्य की विस्मय बोध अवस्था को प्राप्त कर गए थे। बाबा श्री चंद जी ने अपनी विरासत ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ के बड़े भ्राता बाबा गुरदित्ता जी को सौंपी थी। ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ अपनी बाल्यावस्था में बाबा श्री चंद जी का अत्यंत आदर एवं सत्कार कर, अपने जीवन में उन्हें आदर्श के रूप में निरूपित करते थे। इसी कारण से ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ की जीवन शैली वैराग्य से अभिभूत थी।
इतिहास में आता है कि बाबा श्री चंद जी के अनुज बाबा लक्ष्मी चंद जी जब जीते जी परिवार सहित सचखंड की और प्रयाण कर रहे थे तो ब्रह्म योगी बाबा श्री चंद जी ने बेदी वंश को आगे बढ़ाने हेतु अपने हाथ को चार योजन (अर्थात् 20 मील) तक आकाश में लंबा कर अपने अनुज लक्ष्मी चंद के पुत्र धर्म चंद को पृथ्वी लोक पर पुनः उतार लिया था। ऐसी अनेक अलौकिक घटनाओं को बाबा श्री चंद जी ने अपनी जीवन यात्रा में योग शक्तियों के द्वारा अंजाम दिया था।
भाई गुरदास जी की वारां (जिन्हें गुरुवाणी की कुंजी के नाम से संबोधित किया जाता है) में बाबा श्री चंद जी के संबंध में अंकित है—
33: गुरु बंसावली दी हंउ
बाल जती है सिरिचंदु बाबाणा देहुरा बणाइआ॥
लखमी दासहु धरम चंद पोता हुइ कै आपु गणाइआ॥
अर्थात् बाबा श्री चंद जी, अपनी योग शक्ति के माध्यम से सदैव युवावस्था में ही रहे एवं ‘श्री गुरु नानक देव जी की स्मृति में देहुरा स्थापित कर आसीन हुये थे। इनके अनुज अर्थात बाबा लक्ष्मी चंद जी और उनके पुत्र धर्म चंद जी ने गृहस्थ आश्रम को स्वीकार कर उसमें अपनी गिनती करवाई थी। वर्तमान समय में दस गुरुओं और ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ के देश में जितने दूर–दराज इलाकों में धार्मिक स्थान है और जो सिख गुरुओं की निशानियां, पुरातन ग्रंथ, पुरातन शस्त्र एवं सामग्री साथ ही समस्त पुरातन विधाओं को इस उदासीन संप्रदाय के महापुरुष साधु–संतों ने सहेज कर सेवा–संभाल कर रखा हुआ है। ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ और बाबा श्री चंद जी के द्वारा प्रारंभ किया हुआ उदासीन संप्रदाय का नाखून और मांस के रिश्ते के समान एक दूसरे से कटिबद्ध होकर जुड़े हुए हैं। बाबा श्री चंद जी जिन्होंने युगो–युग अटल उदासीन संप्रदाय की नींव को रख रखकर ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की वाणी को प्रचारित–प्रसारित कर एक अकाल पुरख की स्तुति को विशेष महत्व दिया। आज के इस महान शुभ अवसर पर ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ और माता सुलख्ननी जी के सुपुत्र ब्रह्म योगी, उदासीन संप्रदाय के प्रवर्तक बाबा श्री चंद जी को सादर नमन!
नोट1. ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।
2. गुरुवाणी का हिंदी अनुवाद गुरुवाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।
साभार लेख में प्रकाशित गुरुवाणी के पद्यो की जानकारी और विश्लेषण सरदार गुरदयाल सिंह जी (खोज–विचार टीम के प्रमुख सेवादार) के द्वारा प्राप्त की गई है।
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