पूर्वी भारत के सिख: इतिहास, पहचान, समकालीन यथार्थ और सिक्खी के विस्तार की यात्रा
बिहार अपनी भौगोलिक सीमा के भीतर निवास करने वाली विविध जातियों, जनजातीय समुदायों, भाषाओं तथा अनेक धर्मों और आस्थाओं के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का एक अत्यंत बहुरंगी और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध प्रदेश माना जाता है। हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख इन चार महान धर्मों की ऐतिहासिक उपस्थिति से समृद्ध यह भूमि प्राचीन सभ्यताओं की अमूल्य धरोहरों का एक विशाल भंडार अपने भीतर संजोए हुए है। इन चारों धर्मों की जन्मभूमि अथवा विकास भूमि के रूप में बिहार का स्थान विशेष रूप से प्रतिष्ठित रहा है। आज भी यहाँ असंख्य प्राचीन डेरे, आश्रम, स्मारक, मंदिर तथा अन्य पवित्र स्थल विद्यमान हैं, जहाँ श्रद्धा, आस्था और कृतज्ञता के साथ नमन किया जा सकता है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र न केवल राष्ट्रीय, अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी तथा अन्य सिख गुरु साहिबानों के काल से ही बिहार को सिख धर्म के मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान प्राप्त रहा है। श्री गुरु नानक देव साहिब जी की प्रथम उदासी के साथ ही इस क्षेत्र के जनमानस का सिक्खी से सजीव संपर्क स्थापित हुआ। श्री गुरु नानक देव साहिब जी जाति, नस्ल, भाषा और भौगोलिक सीमाओं से परे समस्त मानवता के सार्वभौमिक उपदेशक थे। वे किसी भी प्रकार के सामाजिक या सांस्कृतिक बंधन में सीमित नहीं थे। उन्होंने विश्व के अनेक भूभागों की यात्राएँ कीं और जहाँ – जहाँ भी गए, वहाँ उन्होंने अपने दिव्य विचारों से चेतना का एक नया संसार रचा तथा अनेक आध्यात्मिक केंद्रों की स्थापना की। इसी क्रम में इस पावन भूमि को भी अकाल पुरख के दूत श्री गुरु नानक देव साहिब जी की चरण-धूलि प्राप्त हुई।
छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी, दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी तथा माता सुंदरी जी द्वारा जारी किए गए अनेक हुकमनामे पूर्वी भारत, विशेषकर बिहार के सिखों के नाम संबोधित हैं, जो आज भी ऐतिहासिक अभिलेखों के रूप में उपलब्ध हैं। ये हुकमनामे न केवल धार्मिक आदेश हैं अपितु इस बात के सशक्त प्रमाण भी हैं कि गुरु साहिबानों और इस क्षेत्र की स्थानीय संगत के बीच संबंध कितने गहरे, जीवंत और अर्थपूर्ण थे।
इस भूमि से जुड़े गुरु इतिहास के संदर्भ में स्थानीय सिखों के मन में असंख्य कथाएँ और साखियाँ आज भी सुरक्षित हैं, जिन्हें पुरानी पीढ़ियों ने पीढ़ी – दर – पीढ़ी (सीना – बसीना) अपने बच्चों तक मौखिक परंपरा के माध्यम से पहुँचाया। गुरु साहिबानों की यात्राएँ और उनके साथ जुड़े प्रसंग आज भी जनमानस में जीवंत हैं, जो लोगों के हृदय में गुरु साहिबानों के प्रति गहरी श्रद्धा, आस्था और आत्मीयता को निरंतर पुष्ट करते हैं।
सिक्खी का स्वरूप संपूर्ण बिहार सहित पूर्वी भारत के विस्तृत क्षेत्रों में ही नहीं अपितु उससे आगे भी व्यापक रूप में फैला हुआ रहा है। निस्संदेह, पटना की सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना दिल्ली या पंजाब से भिन्न है, परंतु यहाँ तुलना का विषय न तो भौगोलिक विस्तार है और न ही जनसंख्या का अनुपात। यहाँ भिन्नता मूलतः इस क्षेत्र की लोक मानसिकता और सामाजिक संरचना में निहित है। परिणाम स्वरूप, यहाँ के सिखों की धार्मिक अभिव्यक्ति पंजाब या पश्चिमी विश्व की तुलना में कुछ भिन्न रूप में विकसित हुई परंतु उसकी आत्मा पूर्णतः गुरमत् संमत रही।
गुरु साहिबानों की यात्राओं और उनसे जुड़ी साखियों का प्रभाव इस पूरे क्षेत्र पर गहराई से पड़ा। गुरुओं द्वारा इस भूमि के साथ स्थापित प्राचीन और आत्मीय संबंधों का अपना एक अभूतपूर्व इतिहास है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक इस क्षेत्र में सिख धर्म का मौलिक प्रभाव अत्यंत सशक्त रूप में विद्यमान था। सिख धर्म के प्रचार – प्रसार में उदासी महंतों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। इनके अतिरिक्त निर्मले और ज्ञानी संप्रदायों ने भी जो प्रारंभिक काल में सिख दर्शन के प्रचार की रीढ़ माने जाते थे, इस क्षेत्र में प्रशंसनीय और दीर्घकालिक कार्य किया।
बिहार की जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग गुरु साहिबानों का उपासक था, जिन्हें नानकशाही अथवा नानक पंथी कहा जाता था। लगभग एक शताब्दी पुराने अनेक ऐतिहासिक संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि उस समय सिखों को प्रायः ‘खालसा’ और ‘खोलासा’ इन दो वर्गों में पहचाना जाता था। अनेक स्थानों पर यह भी देखा गया कि बड़ी संख्या में लोग श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ करने में सक्षम थे और गुरु की शिक्षाओं को गहराई से समझते थे।
आज ऐसे लोगों को खोजना कठिन हो गया है। इनमें से अधिकांश अपने पूर्वजों के पुराने धार्मिक ढाँचों में पुनः लौट गए हैं। किंतु यदि उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवन पद्धति से जुड़ी गतिविधियों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो सिख धर्म के साथ उनके ऐतिहासिक संबंधों की स्पष्ट छाया आज भी दृष्टिगोचर होती है। मुख्यतः उदासी, निर्मले तथा कुछ सीमा तक ज्ञानी संप्रदाय के प्रचारकों ने लगभग तीन सौ वर्षों तक गुरु साहिबानों के संदेश का निरंतर और निष्ठापूर्ण प्रचार किया। इसके पश्चात कार सेवा से जुड़े संगठनों और अन्य सिख जत्थों के प्रमुखों ने भी इस क्षेत्र से संपर्क बनाए रखा और अत्यंत समर्पण भाव से कार्य करते हुए पूर्वी भारत के दूरदराज क्षेत्रों तक अपनी पहुँच स्थापित की। इन प्रयासों का प्रभाव आश्चर्यजनक रूप से व्यापक और सकारात्मक सिद्ध हुआ।
पूर्वी भारत में सिखों की उपस्थिति का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना स्वयं श्री गुरु नानक देव साहिब जी का काल। सन् 1508 ईस्वी में अपनी प्रथम उदासी के दौरान श्री गुरु नानक देव साहिब जी पूर्व दिशा की यात्रा करते हुए बंगाल की ओर गए और इस क्रम में इस क्षेत्र के अनेक स्थानों पर विचरण किया। पटना के सालिस राय जौहरी जो उस समय के अत्यंत समृद्ध सर्राफ व्यापारी थे, आप जी श्री गुरु नानक देव साहिब जी के प्रथम श्रद्धालुओं में से एक थे। वे खत्री समुदाय से संबंधित थे और ऐसा माना जाता है कि गुरु साहिब जी लगभग चार माह तक उनके निवास स्थान पर ठहरे। सालिस राय के सेवक अद्धरका, जो अरोड़ा जाति से थे, आगे चलकर सिख मिशनरी प्रचारक बने।
श्री गुरु अमरदास साहिब जी ने इस क्षेत्र में भाई गुरदास तथा कुछ अन्य सिखों को आशीर्वाद प्रदान किया। भाई अद्धरका ने गुरमत् विचारधारा के प्रचार – प्रसार हेतु अन्य महत्वपूर्ण प्रचारकों को भेजा, जिनमें चाचा फग्गू मल जैसे महान व्यक्तित्व सम्मिलित रहे होंगे। इस प्रकार धीरे – धीरे यह क्षेत्र सिख विचारधारा का एक सशक्त केंद्र बनता चला गया।
नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के आगमन के समय पटना में सिख संगत और श्रद्धालु पहले से ही विद्यमान थे। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी सालिस राय के एक वंशज के निवास स्थान पर ठहरे। उस समय पटना में ‘बड़ी संगत’ और ‘छोटी संगत’ सिखों के दो प्रमुख केंद्र थे। भाई अद्धरका के वंशज छोटी संगत के अगुआ थे, जिन्होंने स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी तथा उनके साथ आए सिखों को बड़ी संगत से इस स्थान पर आमंत्रित किया।
उस काल में पटना को भारत का ‘मैनचेस्टर’ कहा जाता था। कपास के थोक व्यापार के कारण इसकी समृद्धि अठारहवीं शताब्दी तक बनी रही। आसपास के क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में सिख श्रद्धालु निवास करते थे। श्री गुरु नानक देव साहिब जी के समय और उसके पश्चात के अधिकांश प्रारंभिक सिख खत्री समुदाय से संबंधित थे। उनके पंजाब में पारिवारिक संबंध थे और वे अपने पूर्वजों की इस मातृभूमि पंजाब में निरंतर आते – जाते रहते थे तथा गुरु साहिबानों के दरबार में श्रद्धा सहित नतमस्तक होते थे। यह समुदाय आपस में सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत सुदृढ़ रूप से जुड़ा हुआ था।
तख़्त श्री हरमंदिर साहिब, पटना (तख़्त पटना साहिब) की प्रबंधकीय समिति के संवैधानिक गठन से पूर्व तख़्त साहिब से संबद्ध सभी ग्रंथी, जिन्हें उस समय ‘महंत’ कहा जाता था; मुख्यतः खत्री समुदाय से संबंधित होते थे। यह परंपरा लंबे समय तक बनी रही। ढाका तथा उसके आसपास निवास करने वाले अधिकांश खत्री महंत सन् 1947 ईस्वी के भारत विभाजन तथा उसके पश्चात बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान विवश होकर इस क्षेत्र को छोड़ने को बाध्य हुए। परिणाम स्वरूप, खत्री पृष्ठभूमि से जुड़े अनेक सिख परिवार समय के प्रवाह में या तो विस्थापित हो गए अथवा सिख इतिहास के दृश्य पटल से लगभग लुप्त होते चले गए। आज ऐसे खत्री सिख बहुत कम दिखाई देते हैं।
उपलब्ध तथ्यों के अनुसार खत्री जातीय पृष्ठभूमि से संबंधित सिखों की उपस्थिति पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अनेक क्षेत्रों में आज भी देखी जा सकती है। इनमें बलिया, बस्ती, वाराणसी, आज़मगढ़, निज़ामाबाद, भभुआ, मधुबनी ज़िले का मधूडी, पटना, महेशवा, सादलपुर, कटिहार, मुराराई, कोटाई तथा कुछ अन्य स्थान सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों की विशिष्टता यह है कि इनमें से अनेक स्थानों को श्री गुरु नानक देव साहिब जी, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी और श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी, इनमें से किसी एक, दो अथवा तीनों गुरु साहिबानों के पावन चरणों का स्पर्श प्राप्त हुआ है।
देश विभाजन से पूर्व ढाका में भी इन सिखों की सशक्त उपस्थिति थी। वहाँ श्री गुरु नानक देव साहिब जी की यात्रा तथा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के दीर्घ प्रवास से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गुरुद्वारे स्थित थे। समय के साथ अनेक स्थानों पर सिखों की संख्या में निरंतर कमी आई और कुछ क्षेत्रों में उन्हें खोजना अब कठिन हो गया है। तथापि, इन स्थानों पर आज भी प्राचीन गुरुद्वारे विद्यमान हैं, जो उस समृद्ध विरासत के मूक साक्षी बने हुए हैं।
गुरुद्वारों की देखरेख, मरम्मत तथा संगत से संबंधित कार्यों को निर्बाध रूप से संचालित करने हेतु उस समय गाँवों अथवा कस्बों के कटरों अर्थात् मंडियों और बाज़ारों की पर्याप्त उपजाऊ भूमि गुरुद्वारों के नाम समर्पित की गई थी। इन भूमियों से प्राप्त आय से गुरुद्वारों का संचालन होता था और बड़े स्तर पर विभिन्न गुरु पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाए जाते थे। इन क्षेत्रों के सिख अपनी क्षेत्रीय विविधताओं के अनुरूप खड़ी बोली, मैथिली, मगही, भोजपुरी से लेकर असमिया और बंगाली जैसी भाषाओं का प्रयोग करते थे, जिससे सिख धर्म की बहुभाषिक और समावेशी प्रकृति का स्पष्ट परिचय मिलता है।
भूले – बिसरे नानक-पंथियों का एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण अंग ‘अग्रहरि सिख’ हैं। ये मुख्यतः वाराणसी तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में पाए जाते हैं और मूलतः व्यापारी अथवा बनिया वर्ग से संबंधित हैं। सासाराम के सिखों में अग्रहरि समुदाय की संख्या विशेष रूप से उल्लेखनीय है। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की सासाराम यात्रा के समय यहाँ खत्री सिखों के साथ – साथ अग्रहरि सिखों की भी सक्रिय उपस्थिति थी। गुरु साहिब जी अत्यंत सम्माननीय सिख प्रचारक चाचा फग्गू मल के निवास स्थान पर कुछ दिनों तक ठहरे थे। परंपरा के अनुसार, राग जैजावंती में रचित प्रसिद्ध शबद-
रागु जैजावंती महला 9 ॥
रामु सिमरि रामु सिमरि इहै तेरै काजि है ॥
माइआ को संगु तिआगु प्रभ जू की सरनि लागु ॥
जगत सुख मानु मिथिआ झूठो सभ साजु है ॥1॥ रहाउ ॥
अर्थात हे मनुष्य ! परमात्मा का भजन कर, राम का भजन, कीर्तन कर ले, यही तुम्हारा उपयुक्त कार्य है। माया का साथ छोड़कर प्रभु की शरण में आ जाओ।
उपरोक्त शबद् की रचना गुरु साहिब जी ने यहीं की थी। इस क्षेत्र की जनसंख्या मुख्यतः सिख धर्म के आध्यात्मिक और भक्ति पक्ष से गहराई से जुड़ी हुई रही है।
सुनार, तेली, लुहार, केसरी, कुशवाहा, केसरवानी, ब्राह्मण तथा अन्य अनेक जातियों और वर्गों से संबंधित लोग आज भी अपने हृदय में सिख धर्म के प्रति प्रेम, श्रद्धा और आत्मीयता संजोए हुए हैं। सासाराम के संदर्भ में यह कथन सार्थक प्रतीत होता है कि—
“सासाराम गुरु के नाम से जीवित है।”
यहाँ समृद्ध विरासत से युक्त अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारे आज भी देखे जा सकते हैं। गुरुद्वारा चाचा फग्गू मल के अतिरिक्त गुरुद्वारा टकसाली संगत, गुरुद्वारा गुरु का बाग आदि अनेक महत्वपूर्ण गुरुद्वारे यहाँ विद्यमान हैं, जिनकी देखरेख संगत अथवा निजी स्तर पर की जाती है। गुरु साहिबानों के नाम पर विद्यालय तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाएँ भी स्थापित हैं। यहाँ के सिख प्रत्येक गुरु पर्व तथा सिख इतिहास से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण दिवसों को अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं।
विभिन्न स्थानों पर आयोजित गुरु पर्व समागम, श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी की ‘छठी’- अर्थात् पुत्र-जन्म के छठे दिन मनाई जाने वाली प्राचीन परंपरा, श्री गुरु नानक देव साहिब जी का ज्योति – ज्योत पर्व (जिसे स्थानीय बोली में ‘श्राद्ध’ कहा जाता है) तथा अग्रहरि सिखों द्वारा आयोजित अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों से यह स्पष्ट होता है कि इस समुदाय की सिख धर्म के प्रति आस्था अत्यंत गहन और स्थायी रही है। ऐसी ही धार्मिक परंपराएँ सिख आबादी वाले दो अन्य क्षेत्रों में भी देखी जा सकती हैं।
पिछले दो शताब्दियों के दौरान इस क्षेत्र के अग्रहरि सिख दो अन्य प्रमुख भूभागों में भी बड़ी संख्या में जाकर बसे। इनमें पहला प्रमुख केंद्र कोल्कता रहा, जहाँ इन सिखों की एक सुदृढ़ और संगठित आबादी नगर के केंद्रीय क्षेत्रों में लंबे समय से निवास करती आ रही है। इनके द्वारा निर्मित गुरुद्वारा भवन कोलकाता नगर की धार्मिक, सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बन चुके हैं। इनमें ‘नानक विद्यालय’ नामक एक अत्यंत प्राचीन शैक्षणिक संस्थान भी सम्मिलित है। अग्रहरि सिख बड़े व्यापारी थे उनके पास विशाल भवन, बाग – बगीचे और यहाँ तक कि निजी गुरुद्वारे भी हुआ करते थे। वर्तमान समय में कोलकाता की ‘छोटी सिख संगत’ की प्रबंधक समिति दो गुरुद्वारों की देखरेख कर रही है। ये सिख मुख्यतः बड़ा बाज़ार, नारकेलडांगा, बागुईआटी तथा नगर के आसपास के क्षेत्रों में निवास करते हैं।
प्रारंभिक काल के सिख निवासी होने के कारण इन समुदायों ने स्थानीय समाज में सिख धर्म के संदेश को फैलाने का निरंतर प्रयास किया। किंतु बीसवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाबी सिखों के बड़े प्रवाह के साथ ये कुछ सीमा तक उपेक्षित होते चले गए। इसके बावजूद, लंबे समय तक चले पारस्परिक संपर्क और सह अस्तित्व के कारण इनके और अन्य सिख समुदायों के बीच धीरे – धीरे निकटता विकसित होती गई। श्री अकाल तख़्त साहिब, अमृतसर के अधीन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति की धर्म प्रचार समिति द्वारा स्थापित सिख मिशन कोलकाता (पूर्वी भारत) ने अपने सतत और अथक प्रयासों से इस सामाजिक, सांस्कृतिक दूरी को पाटने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। बच्चों को गुरबाणी, गुरुमुखी, सिख इतिहास, कीर्तन और जीवन मूल्यों की शिक्षा देने हेतु साप्ताहिक गुरमत् कक्षाओं का संचालन आरंभ किया गया। परिणामस्वरूप, इनके बच्चे और संगत कोलकाता के सामान्य सिख समाज के साथ घुलने, मिलने लगे और आज आपसी समझ, सहभागिता और आत्मीयता के सशक्त संबंध स्थापित हो चुके हैं। ये सिख कोलकाता तथा उसके आसपास के गुरुद्वारों में होने वाली समस्त सिख गतिविधियों में अत्यंत उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।
अग्रहरि सिखों के निवास वाले दो अन्य महत्वपूर्ण गाँव- केदली चट्टी और डुमरी, वर्तमान झारखंड राज्य के चतरा ज़िले में स्थित हैं। पूर्व में यह क्षेत्र हज़ारीबाग ज़िले का हिस्सा था। लगभग दो सौ वर्ष पूर्व व्यापारिक उद्देश्यों से सिख सासाराम (बिहार) तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से इस क्षेत्र में आए थे, जिनमें से अनेक यहीं स्थायी रूप से बस गए। उस समय केदली एक बड़ी ग्रामीण मंडी थी, जहाँ से हज़ारीबाग और गया के मार्ग से कोलकाता तक व्यापार किया जाता था। यहाँ के सिख कालांतर में समृद्ध ज़मींदार, दुकानदार और थोक व्यापारी के रूप में स्थापित हुए। स्थानीय व्यापार और वाणिज्य पर भी इनका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जाता था।
वर्तमान समय में सिख केदली चट्टी, डुमरी तथा हंटरगंज क्षेत्र के गाँवों में निवास करते हैं और आज भी सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन में उनकी सशक्त उपस्थिति दृष्टिगोचर होती है। यह समूचा परिदृश्य पूर्वी भारत में सिख इतिहास, पहचान और सिक्खी के विस्तार की यात्रा को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य अध्याय के रूप में सामने आता है।
इन क्षेत्रों में अधिकांश व्यापार इन्हीं सिखों के हाथों में केंद्रित है और बड़ी संख्या में दुकानें भी इन्हीं की हैं। दो गुरुद्वारा साहिबानों का प्रबंधन स्थानीय समितियों द्वारा किया जाता है। इन गाँवों में सिख धर्म का पर्याप्त प्रभाव विद्यमान है। इन गाँवों के अनेक सिख पिछले सौ वर्षों से अधिक समय से कोलकाता में भी बसे हुए हैं। अग्रहरि सिख पंजाबी की उपभाषाओं के साथ – साथ आपस में भोजपुरी, मगही, कलकत्तिया हिंदी तथा बंगाली भाषा का भी व्यवहार करते हैं; यह बहुभाषिकता इनके सामाजिक, सांस्कृतिक अनुकूलन की एक विशिष्ट पहचान है।
सिखों का एक अन्य प्रमुख समूह बिहार के ज़िला कटिहार में, बरारी पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले गाँवों में निवास करता है। गंगा नदी पर कड़ाह गोला घाट के आसपास बसे गाँव- लक्ष्मीपुर, उछला, गुरु बाज़ार, भंडार तल, हुसेना, भैंसदरा आदि में पर्याप्त सिख आबादी है। इनके कंतन नगर और भवानीपुर के नदी तट से लगे पूर्ववर्ती निवास स्थल नदी की बाढ़ों से पूर्णतः नष्ट हो चुके हैं। कहा जाता है कि श्री गुरु तेग बहादुर जी ढाका जाते समय इस मार्ग से होकर गुज़रे थे। कड़ाह गोला घाट पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण नदी आधारित बंदरगाह रहा है। यह सिख स्वयं को ‘सोधवंशी खालसा’ कहते थे और माल महकमे का स्थानीय रिकॉर्ड भी इस तथ्य की पुष्टि करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पंजाब तथा स्थानीय सिखों के विविध समूहों ने परस्पर घुल, मिलकर यहाँ एक संयुक्त खालसा पहचान को विकसित और स्थापित किया।
अतीत में ये बड़े ज़मींदार थे। आज भी इनके पास भूमि की भारी मालिकी है। प्रारंभ में ये मुख्यतः खेती – बाड़ी में संलग्न रहे, किंतु समय के साथ अन्य कार्यों और व्यवसायों के कारण ये भारत के विभिन्न भागों में फैलते चले गए। ये ढाबे चलाते हैं तथा अनेक गुरुद्वारों, विशेषकर पूर्वी भारत के गुरुद्वारों में ग्रंथी, कीर्तनिए और सेवादार के रूप में सेवाएँ भी अर्पित करते हैं। इसके साथ – साथ ये विभिन्न सरकारी तथा अन्य पेशेवर नौकरियों में भी कार्यरत हैं। यद्यपि इनकी कुल जनसंख्या लगभग पाँच हज़ार से कुछ अधिक ही है, तथापि स्थानीय समाज में इनका प्रभाव और रसूख उल्लेखनीय है। यह पंजाब में बीसवीं सदी के आरंभ में चली सिंघ सभा लहर की विरासत के धारक हैं। तख़्त श्री पटना साहिब से लेकर श्री अकाल तख़्त साहिब, अमृतसर तथा समूचे सिख समुदाय के साथ इनका संबंध सुदृढ़ और सक्रिय है। ये राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों की वास्तविकताओं को भली – भाँति समझते हैं। यही कारण है कि ये इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण स्थानीय और ज़िला स्तरीय पदवियों पर भी आसीन होकर समाज के साथ एकरूप बने रहते हैं। ये सिख नौवें पातशाह के शहीदी दिवस पर एक बड़ा गुरमत् दीवान आयोजित करते हैं।
स्थानीय सिखों के साथ – साथ घरों से दूर रहने वाले सिख भी इस गुरु पर्व में सम्मिलित होने हेतु लौटकर आते हैं और गुरु के शहीदी दिवस को अत्यंत प्रेम एवं श्रद्धा के साथ मनाते हैं। भारत और विश्व के अन्य भागों से भी प्रचारक तथा सिख इस शहीदी दिवस समागम में भाग लेने हेतु यहाँ पहुँचते हैं। समय – समय पर अन्य गुरु पर्व भी विभिन्न गुरुद्वारों द्वारा आयोजित किए जाते हैं। ये सिख आपस में मैथिली भाषा की उपबोली ‘अंगीका’ में संवाद करते हैं और कुछ विशेष अवसरों पर पंजाबी भी बोल लेते हैं। यहाँ की कलवार जाति अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है, जिन पर उदासी और निर्मला संप्रदाय के पुराने सिख प्रचारकों का गहरा प्रभाव रहा। वे बड़ी संख्या में नानकशाही पंथी रहे हैं।
वैशाली ज़िले के एक लगभग गुमनाम से गाँव सिवनगर में पचास से अधिक सिख परिवार निवास करते हैं। ये अपनी पहचान हिंदुओं की ‘कुर्मी’ जाति से जोड़ते हैं तथा विवाह सहित अन्य सामाजिक संबंध भी प्रायः उन्हीं के साथ रखते हैं। ये सरदार सूखा सिंह (संभवतः ‘गुरु बिलास पातशाही’ लिखने वाले ज्ञानी सूखा सिंह) तथा सरदार मोहर सिंह को अपने पूर्वज होने का दावा करते हैं। अन्य कुर्मियों की भाँति ये सिख भी मुख्यतः खेती करते हैं। इनके बीच डॉक्टर, अध्यापक, अकाउंटेंट आदि के रूप में प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत कई शिक्षित लोग भी हैं। कुछ देश के विभिन्न भागों में इंजीनियरिंग आदि से जुड़े लोग हुए हैं। कुछ पूर्वी भारत के विभिन्न गुरुद्वारों के सेवा प्रबंध में सम्मिलित हैं। स्थानीय समुदायों में इनका अच्छा सम्मान है तथा ये राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में बढ़, चढ़कर भाग लेते हैं।
ये सिख आपस में मैथिली और भोजपुरी की मिश्रित बोली ‘वज्जीका’ में बात करते हैं। अनेक गुरु पर्वों पर विशेषकर, श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी का प्रकाश पर्व को ये बड़े स्तर पर मनाते हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के 350वें प्रकाशोत्सव के अवसर पर पटना में अत्यंत भव्य समागम आयोजित कर, विश्वभर के सिखों का हृदय जीतने वाले, गुरु घर के प्रीतवान तथा बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार इसी कुर्मी समुदाय का नेतृत्व करते हैं।
पटना तथा उससे लगे नालंदा, नवादा, जहानाबाद और बाढ़ ज़िलों में कहार, मछवरा, केवट, कुशवाहा, सुड़ी, कुर्मी, पासवान, यादव, तेली, गदेरी, कुम्हार, रविदासिया सहित अनेक जातियों और वर्गों के बहुत से लोगों ने सिख धर्म धारण किया था। इनमें से अधिकांश पटना साहिब तथा आसपास के गुरुद्वारों में ग्रंथी, सेवादार आदि के रूप में अपनी सेवाएँ अर्पित कर रहे हैं। ये आपस में मुख्यतः मगही भाषा बोलते हैं। इनमें ऐसे सिख भी मिलते हैं जिनके कई सदियों से जम्मू, कश्मीर और पंजाब के साथ गहरे संबंध रहे हैं। ये विभिन्न क्षेत्रों में अलग – अलग गुरु पर्व धूमधाम से मनाते हैं और पूर्णतः सिख धर्म तथा गुरमत मर्यादा का पालन करते हैं।
दानापुर के निकट एनखां के राजा राघवेन्द्र धारी सिंह के समय यह सिख पटना तथा निकटवर्ती जहानाबाद, अरवल और औरंगाबाद जैसे ज़िलों में भी बसते थे। अंग्रेज़ी शासनकाल के सरकारी रिकॉर्ड में ‘मिलिटरी ब्राह्मण’ के रूप में जाने जाने वाले बिहार के सबसे सशक्त ज़मींदार ‘भूमिहार’ समुदाय ने भी बड़ी संख्या में सिख धर्म अपनाया। कुछ स्थानीय विधायक (एम.एल.ए.) और कुछ गाँवों के मुखिया भी खालसा बने। कहा जाता है कि इनमें से कुछ ‘रणबीर सेना’ नामक निजी सेना से भी जुड़े रहे हैं।
गया, नवादा और बिहार शरीफ़ क्षेत्रों में विविध पृष्ठभूमियों वाले सिख आज भी देखे जा सकते हैं। आरंभिक काल में नानक पंथ का तीव्र विस्तार महूरी जाति के लोगों के इसमें सम्मिलित होने से हुआ। ये सिख भी मथुरा से उठे अग्रहरियों की भाँति बनिया समुदाय से संबंधित हैं। इनमें भी सामान्य सिखों की तरह तंबाकू के प्रयोग से कठोर परहेज़ का भाव मिलता है। समय के साथ ये सिख बड़े व्यापारी तथा समृद्ध कारोबारी के रूप में उभरे। इन्होंने महंतों से श्री गुरु नानक देव साहिब जी की शिक्षाएँ ग्रहण कीं और नानकशाही डेरों की स्थापना तथा उनकी देखरेख हेतु उदारतापूर्वक भूमि और धन का दान दिया। महूरी, बरनवाल, कोइरी, शाओ, केसरी और अन्य कई जातियों के लोग विभिन्न स्थानीय उदासी संगत से जुड़े हुए थे।
भविष्य में सिक्खी के विकास की संभावनाओं से ओतप्रोत और नवउदित एक बड़ा वर्ग उत्तरी बिहार के अररिया, पूर्णिया और किशनगंज ज़िलों में दिखाई देता है। प्रारंभ में ये सिख मुख्यतः सन् 1970 से 1980 ईस्वी के बीच हरित क्रांति के दौरान पंजाब में प्रवासी मज़दूरों के रूप में आए थे। नौकरी की तलाश में पंजाब आकर रहने से इनके जीवन पर सिख धर्म का गहरा प्रभाव पड़ने लगा। ‘किरत करो, नाम जपो और वंड छको’ के मूल सिद्धांतों के साथ – साथ मानवता में समानता और मानव जाति के प्रति निस्वार्थ सेवा के संदेश ने इन्हें ढहिंदी कलां (नकारात्मक) वाली मानसिकता से उबारने में सहायता की। ये लोग अत्यंत गरीब थे और सामाजिक व्यवस्था में हीनता ग्रस्त जीवन जीने को विवश थे, क्योंकि ये हिंदुओं की सबसे निम्न कही जाने वाली जातियों से संबंधित थे। ये मुख्यतः मुसहर, पासवान, यादव, लोहार तथा इसी प्रकार की अन्य जातियों के थे। सिख धर्म के प्रभाव से इनके भीतर स्वाभिमान के साथ जीने का उत्साह जागा और ये सभी अमृतधारी सिख बन गए।
आज बिहार में निहंग बाणे में दिखाई देने वाले, सदा चढ़दी कला में रहने वाले सिखों का यह वही वर्ग है, जो हलहलिया, परवानपुर, महाराजपुर, गर्गम्मा, गाड़ बालसेरा और अनेक अन्य गाँवों में फैला हुआ है। इन गाँवों के अन्य लोग भी सिख धर्म के अत्यंत निकट हैं और बहुत से लोग सिख जीवन शैली अपनाने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। पंजाब के सिख किसानों के साथ इनकी ‘सीरी – सांझी’ रही होने के कारण सिख धर्म से इनकी निकटता स्वाभाविक रूप से विकसित हुई। पंजाबी सिखों की चढ़दी कला (सकारात्मक) वाली जीवन शैली और स्वभाव का इन पर गहरा प्रभाव पड़ा। ये पाँच बाणियों के नितनेमी हैं, प्रतिदिन कीर्तन श्रवण करते हैं, नियमित रूप से गुरु पर्व मनाते हैं तथा श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी का प्रकाश दिवस अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाते हैं। ये लोग अपनी स्थानीय मैथिली भाषा के साथ – साथ बोलचाल की पंजाबी का भी प्रयोग करते हैं।
सिख मिशन कोलकाता के सेवादार यहाँ कुछ सिखों को विशेषकर ‘सांझीवालता ट्रस्ट’ वालों को प्रेरित करने में सफल हुए, जिन्होंने हलहलिया में गुरुमुखी विद्यालय तथा परवानपुर में एक छोटा सा गुरुद्वारा साहिब बनाने का कार्य आरंभ किया। इस ट्रस्ट ने कुछ अन्य क्षेत्रों में भी गुरुद्वारा साहिब बनाने संबंधी संगत के निवेदन को स्वीकार किया है। निश्चय ही दानी और आर्थिक रूप से समर्थ सिखों को इस क्षेत्र में सिक्खी की जड़ें मजबूत करने हेतु आगे आना चाहिए।
इसके अतिरिक्त बिहार में सैकड़ों उदासी डेरे और कुछ निर्मले डेरे भी हैं, जो कभी सिख धर्म के महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करते थे। ऐसे अनेक स्थानों पर गुरु पर्वों या अन्य विशेष अवसरों पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अखंड पाठ होते हैं। कई स्थानीय लोग पीढ़ियों से इन डेरों के साथ जुड़े हुए हैं। किंतु चिंता का विषय यह है कि अनेक डेरों की संपत्ति अन्य लोगों द्वारा अवैध रूप से दबाई जा रही है और निकट भविष्य में इनके लुप्त हो जाने की आशंका भी व्यक्त की जा सकती है। बड़ी संख्या में ये डेरे समूचे पूर्वी भारत में असंख्य स्थानों और दूरदराज क्षेत्रों में फैले हुए हैं। इन सभी डेरों की सूची तथा उनसे संबंधित समस्त संपत्ति का पूर्ण और सही रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। यह सिख इतिहास और सिख धर्म से प्रेम करने वाले सभी लोगों के लिए गंभीर चिंतन का विषय है।
यह समुदाय समकालीन परिस्थितियों, मुद्दों और समस्याओं का उत्तम तरिके से सामना करता है और आधुनिक युग के बहुरंगी समाज में स्वयं को पूर्ण रूप से ढालता है। फिर भी, यह प्रश्न मन में उठता है कि ये लोग सिक्खी के मानचित्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने के बजाय अँधेरे में गुम क्यों हैं? सिख समुदाय में संबंधों का मूल ताना – बाना प्रेम, प्रतिबद्धता और पारदर्शिता पर आधारित होना चाहिए। इसी हेतु तालमेल और मेलजोल सबसे अधिक आवश्यक हैं। बिहार की अपनी विशिष्ट संस्कृति है। इसी संस्कृति की मुख्यधारा में रहते हुए यह बहुसंख्यक सिख समुदाय अपनी समस्याओं और पीड़ाओं से उबरना चाहता है।
सिख नेताओं, विद्वानों और बुद्धिजीवियों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि पंजाब या दिल्ली जैसी जगहों पर होने वाली राजनीतिक और सामाजिक उथल पुथल इन सिखों के जीवन को किस प्रकार से प्रभावित करती है? प्रायः जब हम सिक्खी की बात करते हैं तो हमारा आशय केवल पंजाब से ही होता है, जो उचित नहीं है। दूर पूर्व, पश्चिम और नीचे दक्षिण तक सिक्खी की उपस्थिति को समान रूप से ध्यान में रखना चाहिए। बेगानापन और भेदभाव की अनुभूति अनेक स्थानों पर विभिन्न वर्गों के सिखों द्वारा अनुभव की जा रही है। कईयों की पहचान तो समाप्ति के किनारे पहुँच गई है। उनकी अपनी – अपनी समस्याएँ हैं, उनकी अपनी – अपनी मान्यताएँ हैं और सबसे महत्वपूर्ण, उनकी अपनी – अपनी बोलियाँ हैं; अर्थात् उनकी विश्व दृष्टि भी भिन्न है। निस्संदेह हमारी आस्था, इतिहास, विचारधारा तथा केंद्रीय स्थलों सहित अनेक विरासत साझा हैं, परंतु निवास स्थल, वहाँ की संस्कृति, बोलियाँ और राजनीतिक स्थितियाँ परस्पर भिन्न हैं और इस भिन्नता को समझे बिना समाधान संभव नहीं।
समूचे सिख समुदाय को इस तथ्य के प्रति सजग होना चाहिए कि जहाँ सन् 2017 ई.में श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के पटना साहिब में 350वें प्रकाश पर्व का वर्ष है, वहीं यह वर्ष सन 2025 ई. में नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का 350वाँ शहादत वर्ष भी है। जिन स्थानों को पिछले पाँच सौ वर्षों से अधिक समय में श्री गुरु नानक देव साहिब जी, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी और श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के चरण-कमलों से पवित्रता प्राप्त हुई है, सिखों को उन स्थलों के विषय में जानकारी होनी चाहिए और वहाँ जाकर प्रत्यक्ष दर्शन भी करना चाहिए।
पटना साहिब के साथ – साथ बिहार, झारखंड, ओडिशा, असम, पश्चिम बंगाल और यहाँ तक कि बांग्लादेश में स्थित ऐतिहासिक महत्व वाले समस्त गुरुद्वारा साहिबानों के साथ तालमेल स्थापित होना ही चाहिए। यह कार्य पटना साहिब से आरंभ होना चाहिए और इसमें बिहार के राजगीर, राजौली, सासाराम, गया, लक्ष्मीपुर व महेशवा (कटिहार), हलहलिया तथा अररिया ज़िले के गाँव; पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी, निज़ामाबाद, बलिया सहित अनेक स्थान; असम के धोबड़ी साहिब तथा नौगांव ज़िले के गाँव; बांग्लादेश के ढाका, चिटगाँव और माइमेनसिंह; पश्चिम बंगाल के मालदा, कोलकाता और चंद्राकोना; ओडिशा के कटक, पुरी और इनके अतिरिक्त ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अन्य गुरुद्वारों, उदासी और निर्मला डेरों, मठों आदि को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। यही वह व्यापक दृष्टि है जो पूर्वी भारत में सिक्खी की जड़ों को सुरक्षित, सुदृढ़ और जीवंत बनाए रख सकती है।
पूर्वी भारत में सिख पहचान : चुनौतियाँ और संभावनाएँ
भागलपुर से लगभग 40–50 किलोमीटर तथा श्री पटना साहिब से क़रीब 290 किलोमीटर की दूरी पर असम रोड पर स्थित कटिहार ज़िले का लक्ष्मीपुर क्षेत्र पूर्वी भारत में सिख इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण किंतु अपेक्षाकृत उपेक्षित कड़ी है। यह क्षेत्र न केवल सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से संघर्षशील है अपितु यहाँ सिखों की ऐतिहासिक उपस्थिति और निरंतर जीवित सिक्खी परंपरा भी दृष्टिगोचर होती है। आज भी इस अंचल में झुग्गी, झोपड़ियों, बुनियादी सुविधाओं के अभाव और कठिन ग्रामीण जीवन की परिस्थितियों के बीच सिख समुदाय अपनी पहचान और धार्मिक चेतना को सहेजे हुए है।
लक्ष्मीपुर में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब इस क्षेत्र की सिख विरासत का केंद्रीय आधार है। यह स्थान नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की स्मृति से जुड़ा हुआ है, किंतु ऐतिहासिक प्रमाण यह भी बताते हैं कि इससे पूर्व श्री गुरु नानक देव साहिब जी अपनी पूर्वी भारत की यात्रा के दौरान यहाँ ठहरे थे। उसी काल में इस क्षेत्र में नानक पंथी श्रद्धालुओं का एक सशक्त आधार विकसित हुआ। बाद में जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी पुनः यहाँ पधारे, तो सिख संगत का विस्तार और अधिक व्यापक हो गया तथा यह क्षेत्र आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।
गंगा नदी के तट से जुड़ी परंपराएँ इस स्थान को विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं। संगतों के विस्तार के साथ गंगा घाट के किनारे खुले रूप में कड़ाह प्रसाद की देगें सजने लगीं। जिस घाट पर यह कड़ाह प्रसाद वितरित होता था, वही आगे चलकर ‘कड़ाह घाट’ कहलाया और गोलों के रूप में कड़ाह प्रसाद वितरित किए जाने के कारण यह क्षेत्र ‘लक्ष्मीपुर कड़ाह गोला’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी स्थानीय रेलवे स्टेशन ‘कड़ाह गोला’ का नाम इसी ऐतिहासिक परंपरा की पुष्टि करता है।
यह स्थान सिख इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराता है। यहाँ श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की मुहर से युक्त अनेक हुकमनामे आज भी सुरक्षित बताए जाते हैं, जो इस क्षेत्र की संगत को शस्त्र एवं माया भेजने से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त, भाई मंगल सिंह द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक नोट भी उपलब्ध है, जिसमें नांदेड़ की धरती पर श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी पर हुए आक्रमण का प्रत्यक्ष विवरण अंकित है। उल्लेखनीय है कि भाई मंगल सिंह गुरु साहिब के अंगरक्षक थे और इसी लक्ष्मीपुर क्षेत्र के निवासी थे।
इस क्षेत्र में सन् 1726 ईसवी की एक हस्तलिखित बीड़ का सुरक्षित होना भी विशेष महत्त्व रखता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, नानक पंथी श्रद्धालु जब नदी मार्ग से ढाका की ओर वस्त्र-व्यापार हेतु यात्रा करते थे, तब वे अपनी नौकाओं में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश कर साथ ले जाते और मार्ग में निरंतर पाठ करते रहते थे। एक बार बाढ़ के दौरान यह बीड़ जल में बह गई, किंतु लगभग छह महीने पश्चात गंगा के मध्य एक सूखे स्थान से पुनः प्राप्त हुई और श्रद्धा पूर्वक गुरुद्वारा साहिब में स्थापित की गई। आज भी इस बीड़ पर जल चिह्न इसके ऐतिहासिक प्रवास की साक्षी बने हुए हैं।
इस हस्तलिखित बीड़ की एक विशेषता यह भी बताई जाती है कि इसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में संकलित बाणियों के अतिरिक्त ‘राग रामकली रतनमाला महला पहला’ शीर्षक के अंतर्गत एक अतिरिक्त बाणी अंकित है। इसकी भाषा, शैली और संरचना गुरु कालीन परंपरा से साम्य रखती है तथा ‘सिद्ध गोष्ठि’ से इसका निकट संबंध विद्वानों के लिए शोध का विषय बन सकता है। अंत में राजा शिवनाभ की साखी ‘हकीकत राह मुकाम राजा शिवनाभ की’ शीर्षक के अंतर्गत वर्णित है, जो इस बीड़ की ऐतिहासिक और वैचारिक विशिष्टता को और गहराती है।
आज भी लक्ष्मीपुर तथा उसके आसपास के क्षेत्रों जैसे- गुरु बाज़ार, महेशवा, सादलपुर, भवानीपुर, उचला, पूर्णिया, भंडारतल और राजा पोखर में सिखों की उल्लेखनीय आबादी निवास करती है। केवल लक्ष्मीपुर में ही लगभग तीन हज़ार सिख बताए जाते हैं, जबकि समूचे अंचल में यह संख्या सात से आठ हज़ार के बीच मानी जाती है। अधिकांश सिख पूर्ण रहित एवं गुरमत मर्यादा का पालन करने वाले तथा अमृतधारी हैं। यद्यपि उनकी दैनिक बोली हिंदी है, फिर भी वे पंजाबी भाषा और सिख परंपराओं से गहराई से जुड़े हुए हैं।
इस क्षेत्र की एक बड़ी विडंबना यह है कि इतनी सुदृढ़ सिख चेतना के बावजूद अब तक किसी भी प्रमुख पंथक संगठन द्वारा यहाँ संगठित और सतत धर्म प्रचार की ठोस व्यवस्था नहीं की गई है। स्थानीय सिखों का यह भी कहना है कि उन्होंने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति सहित विभिन्न संस्थाओं से संपर्क करने का प्रयास किया, किंतु अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। इसके बावजूद, इन सिखों का डेरावाद या व्यक्ति पूजा से दूर रहना उनकी वैचारिक परिपक्वता और गुरमत के प्रति निष्ठा को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
संदर्भ :
इस आलेख की रचना हेतु जिन विद्वान लेखकों से प्रेरणा प्राप्त हुई है, उनके द्वारा विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों तथा वहाँ निवास करने वाले सिख समुदायों पर आधारित विस्तृत एवं शोधपरक लेख पूर्व में ही रचित किए जा चुके हैं। ये लेख पंजाबी, अंग्रेज़ी एवं हिंदी भाषाओं की अनेक प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं के साथ – साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों की शोध पत्रिकाओं में भिन्न – भिन्न शीर्षकों के अंतर्गत प्रकाशित हुए हैं तथा अनेक अकादमिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा आयोजित सेमिनारों में प्रस्तुत भी किए गए हैं। संबंधित तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भों एवं उनकी प्रासंगिकता के विषय में अधिक विस्तार से जानकारी प्राप्त करने हेतु पाठक निम्नलिखित लेखों का अवलोकन कर सकते हैं—
अक्तूबर 2009 में—
1) Sikhs Living Other Than Punjab — तोहरा इंस्टीट्यूट ऑफ सिख स्टडीज़ द्वारा आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत किया गया और यह आंशिक रूप से The Sikhs—Beyond Punjab शीर्षक के अंतर्गत Sikh Review में प्रकाशित हुआ।
2) Sikhs of Sasaram — दिनांक 30–31 … 2010 को … ‘भूले-बिसरे सिखों के तीसरे सम्मेलन’ में पढ़ा गया परचा, जो Sikh Review में Roots of Faith—Sikhs of Sasaram शीर्षक के अंतर्गत छपा। इसका पंजाबी रूप ‘ਸਾਸਾਰਾਮ ਦੇ ਵਸਨੀਕ ਸਿੱਖ’ गुरमत् प्रकाश के जनवरी 2011 अंक में तथा बाद में अनेक अन्य पंजाबी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ।
3) ‘ਘਰੋਂ ਦੂਰ ਘਰ’ (घरों दूर घर) — पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला द्वारा कोलकाता में आयोजित पूर्वी भारत पंजाबी सम्मेलन के सेमिनार में प्रस्तुत किया गया शोधपत्र। पंजाबी रूप गुरमत् प्रकाश में और अंग्रेज़ी रूप Abstract of Sikh Studies के अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित हुआ। मुंबई सिंह सभा के ऑनलाइन पत्र में 5 मई 2011 को Home away from Home शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुआ।
4) ‘ਹਲਹਲੀਆ ਦੇ ਸਿੱਖ’ (हलहलीआ दे सिख) — पंजाबी में गुरमत् प्रकाश तथा सिख फुलवाड़ी में और अंग्रेज़ी में Blessed Sikhs of Bihar शीर्षक से Sikh Review (May 2013) में प्रकाशित हुआ।
5) ‘ਸੋਧ ਵੰਸ਼ੀ ਖਾਲਸਾ- ਸਾਡੀ ਅਣਜਾਣੀ ਵਿਰਾਸਤ’ (सोध वंशी खालसा- साढी अणजाणी विरासत)— यह परचा गुरमत् प्रकाश के नवंबर 2014, दिसंबर 2014 तथा जनवरी 2015 अंकों में प्रकाशित हुआ। इसका अंग्रेज़ी रूप गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के शोध-पत्र तथा Sikh Review के जुलाई और अगस्त 2015 अंकों में प्रकाशित हुआ।
6) ‘ਵੈਸ਼ਾਲੀ ਦੇ ਸਿੱਖ’ (वैशाली दे सिख) — गुरमत् प्रकाश के नवंबर और दिसंबर 2015 अंकों में प्रकाशित हुआ। गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के शोध-पत्र में भी …।
7) Kedli Chatti and Dumri (Jharkhand)—Two More Pearls in the String of Sikhism — Abstracts of Sikh Studies (Vol. XVIII, Issue 2) के अप्रैल–जून 2016 अंक में प्रकाशित हुआ।
8) ‘ਗੁਰੂ ਬੋਲੀ ਪੰਜਾਬੀ’ (गुरु बोली पंजाबी) — यह परचा पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला द्वारा आयोजित पंजाबी कॉन्फ्रेंस–2016 में प्रस्तुत किया गया।
आभार-
यह आलेख पूर्वी भारत में सिख समुदाय की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को समझने, सहेजने और प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और दायित्वपूर्ण प्रयास है। इस दुर्लभ, तथ्यात्मक और शोधपरक सामग्री के मूल संकलन हेतु मूल लेखक- 1. डॉ॰ जगमोहन सिंह गिल (e_mail: [email protected]) 2. अमरीक सिंह शेर ख़ाँ (e_mail: [email protected]) द्वारा प्रस्तुत उनके आलेख जो की गुरुमुखी की कृति भूले – बिसरे नानक पंथी नामक पुस्तक में प्रकाशित किए गये है, इन लेखकों ने वर्षों तक विभिन्न अंचलों में जाकर वहाँ निवास करने वाले सिख समुदायों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित किया, लोक स्मृतियों, मौखिक परंपराओं, ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और स्थलीय साक्ष्यों को निष्ठा, धैर्य और प्रामाणिकता के साथ संकलित किया तथा पूर्वी भारत के उस सिख भूगोल को उजागर किया जो प्रायः मुख्यधारा के विमर्श से ओझल रहा है। साथ ही, इस सामग्री को हिंदी भाषा में रूपांतरित, संपादित एवं समकालीन पाठकीय संदर्भ में प्रस्तुत करने का कार्य हिंदी के लेखक, संपादक / प्रस्तुतकर्ता डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’ द्वारा इस उद्देश्य से किया गया है कि मूल लेखक के विचार, अनुभव और शोध निष्कर्ष व्यापक हिंदी के पाठक वर्ग तक सहज रूप में पहुँच सकें और सिख इतिहास, पहचान तथा सिक्खी के विस्तार की यह महत्त्वपूर्ण विरासत सुरक्षित रह सके। यह संयुक्त प्रयास केवल एक लेखन या संपादन का कार्य नहीं अपितु सिख इतिहास की रिक्त कड़ियों को जोड़ने, सांस्कृतिक स्मृति को संरक्षित करने और भावी पीढ़ियों के लिए संदर्भ – सामग्री उपलब्ध कराने की एक साझी साधना है। दोनों लेखकों की यह समर्पित भूमिका निश्चित ही सिख इतिहास और समाज के अध्ययन में एक सशक्त, विश्वसनीय और प्रेरक योगदान सिद्ध होगी, ऐसी दृढ़ आस्था के साथ दोनों लेखकों के प्रति सादर, विनम्र एवं कृतज्ञता पूर्ण आभार प्रकट किया जाता है।