पत्रकारिता के मसीहा: अशोक अग्रवाल जी की स्मृति में–

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पत्रकारिता के मसीहा: अशोक अग्रवाल जी की स्मृति में–

पुणे से प्रकाशित निर्भीक दै. भारत डायरी के बेधड़क वरिष्ठ, वरेण्य पत्रकार, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आम लोगों की आवाज को सतत् बुलंद करने वाले हिंदी दैनिक अखबार ’भारत डायरी’ के संस्थापक, संपादक श्री अशोक अग्रवाल जी का देहांत 09/09/24. को पुणे में ह्रदय गति रुकने से हूआ| वैसे तो मेरा इस अखबार के वरिष्ठ वरेण्य संस्थापक-संपादक ‘श्री अशोक जी अग्रवाल’ से अत्यंत पुराना और घनिष्ट संबंध था, कोरोना काल में जब मैंने अपने लेखन को  मंझाव देकर पुनः दिशा दी, तब उन्होंने मेरी लेखनी को परिष्कृत करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने मुझे हमेशा लिखने और सत्य को बिना किसी डर के प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे यह संबंध और भी प्रगाढ़ होते चले गये। यह संबंध कब घनिष्ठ मित्रता में परिवर्तित हो गए पता ही नहीं चला| आप जी हमारी टीम खोज-विचार के आप जी अत्यंत स्नेही शुभचिंतक थे, विगत दो वर्षों से इस प्रसिद्ध हिंदी दैनिक का कार्यालय अपनी नवीन-प्रशस्त वास्तु में स्थानांतरित हुआ है| पुणे शहर के मध्यवर्ती भाग नरपतगीरी चौक सोमवार पेठ की सिद्धि विनायक केसर इमारत के दूसरे मजले से इस कार्यालय का कामकाज जब से प्रारंभ हुआ तो अशोक जी से लगभग नित्य ही मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा था, निश्चित ही मृदभाषी अशोक जी समर्पित हिंदी सेवी, प्रभावी वक्ता और निष्पात लेखक तो थे ही, इन सबसे पहले वे एक अच्छे इंसान और उत्तम गृहस्थ भी थे। पुणे के समाज जीवन में आप जी मानवीय संवेदनाओं के उत्कृष्ट सेतु थे।  अशोक जी का जीवन संघर्ष और साहस का प्रतीक था। आप जी ने एक औपचारिक वार्तालाप में अपनी ’आपबीती’ सुनाते हुए कहा था कि मैं तो पेशे से फुटवियर के व्यवसाय से जुड़ा हुआ था परंतु सन् 1985 ई. में हमारे परिवार के साथ क्रूर काल चक्र का ऐसा वज्रपात हुआ कि एक सड़क दुर्घटना में मैंने अपने पिता जी, चाचा जी के बेटे, बहन और बहन के बेटे अर्थात मेरे भांजे को खो दिया। इस सड़क दुर्घटना में मैं और मेरी माता जी गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे, इस हादसे में हमारे परिवार के 14 और सदस्य भी गंभीर जख्मी हुए थे, जैसे सब कुछ एक पल में उजड़ गया और मैं अपना और अपनी माता जी का लंबे समय तक इलाज करवाता रहा। इस कारण से मुझे न्यायालय के लगभग 5 वर्षों तक चक्कर लगाने पड़े थे। उस समय प्रशासन की लाल फीताशाही और आम लोगों की व्यथाओं को देखते हुए मेरा ह्रदय पसीज उठता था। मैंने पुन: अपने व्यवसाय को स्थापित करने का प्रयत्न किया, उस समय में व्यावसायिक गतिविधियों को उत्तम आयाम देने के लिए मुझे दूरभाष की अत्यंत आवश्यकता थी और उस समय दूरभाष के पंजीकरण के पश्चात लगभग 10 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था परंतु कुछ मित्रों ने मुझे परामर्श दिया कि मैं स्वयं का अखबार प्रकाशित करूं तो मुझको दूरभाष का कनेक्शन तुरंत प्राप्त हो सकता है। इस कारण से मेरी अखबार प्रकाशित करने की रुचि पैदा हुई थी, साथ ही मैं इस माध्यम से आम लोगों की पुरजोर आवाज को भी उठाना चाहता था और आम लोगों का यह संघर्ष अंततः उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में ले आया। आप जी ने अपनी ‘आपबीती’ में बताते हुए कहा था कि उस समय में दूरदर्शन पर हिंदी फिल्म ‘दिल्ली डायरी’ अत्यंत चर्चित थी और इसी तर्ज पर मैंने अपने प्रकाशित होने वाले अखबार का नाम ‘भारत डायरी’ रखा और इस नाम की सूचना-प्रसारण मंत्रालय दिल्ली से मुझे अनुमति भी प्राप्त हो गई थी। पुणे जैसे शहर में साप्ताहिक/दैनिक अखबार हिंदी भाषा में प्रकाशित करना ‘लोहे के चने चबाने’ के समान था परंतु इस कार्य को सफल बनाने हेतु आदरणीय अशोक अग्रवाल जी के परम मित्र और प्रसिद्ध पत्रकार आदरणीय श्री लवकुश तिवारी जी ने उत्तम साथ निभाते हुए उनके स्वयं के ज्ञान का उपयोग कर इस दैनिक/साप्ताहिक अखबार को प्रकाशित करने में अपना अनुपम और अमूल्य योगदान दिया है और भविष्य में भी देते रहेंगे। इस अखबार को प्रकाशित करने के लिए आवश्यक सभी सरकारी खानापूर्ति हो चुकी थी एवं सभी शुभचिंतकों का आग्रह था कि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से इस अखबार के प्रथम अंक आवरण का किया जाए। मित्रों की सहायता से उस समय में प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता, लेखक, कलाकार, कवि, दर्शन शास्त्री और सिविल इंजीनियर की डिग्री से शिक्षित ’श्री कादर खान जी’ का येरवडा परिसर के समीप स्थित कोरेगांव पार्क में निवास हुआ करता था। उनसे किसी भी प्रकार की जान-पहचान ना होते हुए भी जब ‘श्री अशोक अग्रवाल जी’ उनसे मिलने उनके निवास स्थान पर गए एवं औपचारिक वार्तालाप के पश्चात अपने आने का मकसद ’श्री कादर खान जी’ को बताया तो उन्होंने स्वयं साहित्य के प्रति अपने स्वयं के जीवन को समर्पित कर रखा है ऐसा उन्होंने स्वयं बताया और इस सामाजिक कार्य को अपने कर-कमलों से संपन्न करने हेतु तुरंत हामी भर दी एवं अखबार को निर्भीक, बेधड़क और सच की आवाज को बुलंद करने के लिए उन्होंने स्वयं प्रोत्साहित किया था। 8 अगस्त सन् 1997 ई. को ‘श्री कादर खान जी’ के कर-कमलों से पुणे में प्रकाशित साप्ताहिक/दैनिक ‘भारत डायरी’ के प्रथम अंक का विमोचन किया गया था। उस समय पूरे शहर के कई पार्षद, आम नागरिक, बुद्धिजीवी और स्नेही पाठक इस शुभारंभ के कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उपस्थित हुए थे। अखबार के अंक के विमोचन के पश्चात ‘श्री कादर खान जी’ ने अखबार को पढ़ने के पश्चात अपने मनोगत व्यक्त करते हुए परामर्श दिया कि भविष्य में अखबार की भाषा मृदुभाषी संस्थापक-संपादक ‘श्री अशोक अग्रवाल जी’ की तरह सोम्य होनी चाहिए। ‘श्री कादर खान जी’ अपने अंतिम समय तक इस अखबार के और संचालक मंडल के परिवारों से हृदय से जुड़े रहे और समय-समय पर परामर्श देकर मार्गदर्शन भी करते रहें। ‘श्री अशोक अग्रवाल जी’ ने अपने संपादकीय मंडल के सहयोग से घोषणा कर कहा था कि प्रत्येक वर्ष पुणे से प्रकाशित इस प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ‘भारत डायरी’ की और से विभिन्न क्षेत्रों में अपने उल्लेखनीय योगदान से समाज की उन्नति और चहुंमुखी विकास के कार्य को अंजाम देने वाले व्यक्ति को ‘श्री कादर खान जी’ की स्मृति में उनके जन्मदिन पर  विशेष ‘जीवन गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित किया जायेगा| इस संबंध में कनाडा में निवास करने वाले ‘श्री कादर खान जी’ के परिवार से योग्य सहमति प्राप्त कर ली गई है और इस वर्ष दै. भारत डायरी ने अपने रजत जयंति वर्ष में प्रवेश किया है इसलिए इस वर्ष आप जी ‘श्री कादर खान जी’ की स्मृति में पहला जीवन गौरव पुरस्कार प्रसिद्ध अभिनेता जितेंद्र कपूर जी को 14 सितंबर 2024. के दिवस माननीय लोकनेता ‘श्री शरद पवार जी’ के कर- कमलों से प्रदान करने का मानस बना रहे थे परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था| 

स्वर्गवासी अशोक जी के जीवन को मैं अत्यंत नजदीक से देखा है| मैं जानता हूं कि अखबार को उन्नयन और प्रतिष्ठा से सामाजिक सद्भाव के साथ चलाने में अत्यंत कठिन श्रम करना पड़ता है और अनेक कठिनाईयों से रुबरु होना पड़ा। भावुक होकर अशोक जी बताया करते थे कि मैं तो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अकेला ही चल पड़ा था, लोग जुडते गये और कारवां बनता गया। आपने एक कुशल संपादक के रूप में पत्रकारिता के व्यापक चिंतन के धरातल पर जीवन में खरपतवार की तरह पनपते पूर्वाग्रहों से मुक्त रहने की कुशलता आप जी ने अपने दै. भारत डायरी अखबार को प्राप्त कर दी थी। आप जी ने बताया था कि मुझे मेरे परिवार और माता विद्या देवी जी ने हमेशा आशीर्वाद देकर प्रोत्साहित किया। आप जी ने अपनी ’आपबीती’ में बताया था कि मुझे मेरे अपने अग्रवाल समाज ने अत्यंत प्रेम, सहयोग और सहारा दिया। उन्होंने बताया था कि साथ ही मेरे स्वयं के पुणे के अन्य समाज जैसे कि, सिंधी समाज, सिक्ख समाज, मारवाड़ी समाज, गुजराती समाज एवं अन्य उत्तर भारतीय समाज के लोगों से अत्यंत घनिष्ठ व निकट के प्रगाढ़ संबंध है, इस कारण से भी मुझे और ’भारत डायरी’ को पुणे के सभी समाज के लोगों ने विशेष रूप से आशीर्वाद देकर प्रोत्साहित किया। ‘श्री अशोक अग्रवाल जी’ का गुरवाणी और सिख गुरुओं एवं सिख इतिहास में गहरी रुचि थी। पुणे के सिख समाज में आपका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। दैनिक ’भारत डायरी’ में सिख समाज की खबरों और गुरमत के प्रचार-प्रसार के लिए लिखे गए लेखों को विशेष स्थान लेकर प्रकाशित किया जाता है। आप जी का टीम खोज-विचार (मार्गदर्शक: इतिहासकार सरदार भगवान सिंह जी ’खोजी’) से अत्यंत निकट का प्रगाढ़ संबंध था। अशोक जी की पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं थी, बल्कि समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी का प्रतीक थी। अशोक जी ने हमेशा अपनी कलम के माध्यम से सत्य को उजागर किया और समाज में फैली असमानताओं के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद किया। उनके जीवन में अनुशासन, सत्य और निडरता का अद्वितीय समन्वय था, जिसे उन्होंने अपने अखबार के माध्यम से समाज के अंतिम वर्ग तक पहुँचाया।

आज पुणे की पत्रकारिता के जगत में निश्चित एक ‘एक निष्काम पत्रकार के क्षितिज का अस्तांचल’ हो गया है। निश्चित ही अशोक जी के अंतस् में संवेदना का झरना कलकल करता बहता रहता था, उनसे मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उनकी वाणी की शीतलता का अनुभव होता था। इस निर्भीक, निडर और अनुशासित पत्रकार के लिए हम पुणे वासियों का मन अत्यंत व्यथित हैं परंतु ईश्वर के आगे किसी की नहीं चलती, वाहिगुरु जी के चरणों में प्रार्थना है कि, वाहिगुरु जी उनके परिवार को संबल प्रदान करें| वर्तमान समय में उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री विशाल अग्रवाल जी ने संपादक पद की जवाबदेही स्वयं के कंधों पर संभाली हुई है, श्री विशाल अग्रवाल और ‘भारत डायरी’ परिवार के उज्जवल भविष्य के लिए स्वस्ति कामनाएं!

अंत में मैं अपनी कलम को विराम देकर इतना ही लिखना चाहता हूँ—

कलम की ताकत को उन्होंने समझा, उनके हर शब्द में सत्य था,
अनुशासन में बंधे थे, निर्भिकता की  पत्रकारिता उनका यथार्थ था।
सत्य का जो प्रहरी था, अनुशासन जिसकी ढाल,
निडरता से चलता था, इस संपादक के संपादन का कमाल।

निर्भीकता का दीप जला, संपादन की ज्योति,
मर्यादा में ढलकर ही, उन्होंने गढ़े शब्दों के मोती।
स्मृतियाँ मधुर हैं उनकी, जैसे जीवन का एक उजला सवेरा,
निडर, सत्य के ध्वजवाहक, उनकी बहुमूल्य कृतियों का बसेरा।

 


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