नानक लामा: हिमालय की वादियों में गूंजती गुरुवाणी
जब-जब मानवता मार्ग से भटकी, तब-तब किसी महापुरुष ने सत्य का दीप प्रज्वलित किया। पंद्रहवीं शताब्दी के उस आलोक-पुंज, श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने भी यही किया। वे जहाँ-जहाँ गए, वहाँ की भ्रमित चेतना को अंधविश्वास, कर्मकांड और मिथ्या आडंबरों की धुंध से निकालकर सत्य, नाम और मानव-एकता का संदेश दिया। उनका देश-देशांतरों का विस्तृत भ्रमण केवल यात्रा नहीं था, वह एक आध्यात्मिक जागरण-अभियान था। मुसलमानों ने उन्हें अपना पीर माना, हिंदुओं ने अपना सद्गुरु; और समय के साथ विभिन्न संस्कृतियों ने उन्हें अपने-अपने भाव से स्वीकार किया। पूर्वी भारत और तिब्बत के अनेक क्षेत्रों में वे “नानक लामा” के रूप में आज भी स्मरण और पूजित हैं।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी का सुमेरु पर्वत की ओर प्रस्थान मात्र एक भौगोलिक यात्रा नहीं था। वहाँ उच्च कोटि के तपस्वी योगियों का निवास था, ऐसे साधक, जिन्होंने तप, संयम और ध्यान की ऊँचाइयों को छुआ था। श्री गुरु नानक देव साहिब जी का उद्देश्य इन योगियों से संवाद स्थापित कर उन्हें यह समझाना था कि तप और त्याग का परमार्थ समाज से विमुख होना नहीं अपितु समाज के भीतर रहकर मानव-कल्याण का सेतु बनना है। वे चाहते थे कि तप की ज्वाला लोक-कल्याण की लौ बने, और वैराग्य समाज-सुधार का साधन।
हिमाचल और कश्मीर की घाटियों से होते हुए, और आगे नेपाल, सिक्किम तथा भूटान के दुर्गम पथों को पार करते हुए, श्री गुरु नानक देव साहिब जी पूर्वी तिब्बत पहुँचे। वहाँ के नानक-नाम-लेवा आज भी उन्हें ‘नानक लामा’ कहकर स्मरण करते हैं। पंजाब और मुख्यधारा के सिख समाज के लिए यह तथ्य आश्चर्यजनक हो सकता है कि दूरस्थ हिमालयी अंचलों में एक बड़ा समुदाय श्री गुरु नानक देव साहिब जी को बौद्ध परंपरा के आलोक में ‘लामा’ के रूप में पूजता है। परंतु यही तो गुरु की महिमा है; सीमाओं से परे, संप्रदायों से ऊपर, मनुष्य के अंतःकरण में वास करने वाली।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी की उदासियाँ तिब्बत, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान तक पहुँचीं। इन प्रदेशों में, जहाँ बौद्ध धर्म की गहन परंपरा है, श्री गुरु नानक देव साहिब जी को ‘गुरु नानक लामा’ के रूप में सम्मान दिया गया। पूर्वी तिब्बत के अनेक बौद्ध मंदिरों में आज भी उनकी स्मृति और उपदेशों की छाप दृष्टिगोचर होती है।
जिस कालखंड में श्री गुरु नानक देव साहिब जी तिब्बत पहुँचे, वहाँ करमा-पा (लाल टोपी धारण करने वाले) और गेलू-पा (पीली टोपी वाले) दो प्रमुख बौद्ध संप्रदायों के बीच धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष चल रहा था। करमा-पा संप्रदाय ने श्री गुरु नानक देव साहिब जी के उपदेशों को आत्मसात किया, जबकि गेलू-पा ने उनका विरोध किया। यह प्रसंग दर्शाता है कि सत्य का स्वर जहाँ स्वीकारा जाता है, वहाँ परिवर्तन की लहर उठती है; और जहाँ भय या अहंकार होता है, वहाँ विरोध भी जन्म लेता है।
तिब्बत में आज भी लगभग एक हजार ऐसे मठ बताए जाते हैं, जहाँ श्री गुरु नानक देव साहिब जी को स्मरण और पूजित किया जाता है। अनेक स्थानों पर उन्हें बुद्ध का अवतार मानकर आदर दिया जाता है। उनके उपदेशों और जीवन-वृत्तांत को तिब्बती भाषा में संरक्षित रखा गया है; मानो हिमालय की श्वेत चोटियों ने उनकी वाणी को अपने भीतर सँजो लिया हो।
सिक्किम की पावन धरती पर भी श्री गुरु नानक देव साहिब जी की अनेक स्मृतियाँ जीवित हैं। वहाँ स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा ‘नानक लामा साहिब’ विशेष महत्त्व रखता है। यह वह स्थल है, जहाँ उनके चरणों की पावन छाया पड़ी मानी जाती है। गंगटोक से लगभग सौ मील उत्तर दिशा में स्थित एक मठ में यह विश्वास जीवित है कि तिब्बत की ओर प्रस्थान करते समय श्री गुरु नानक देव साहिब जी वहाँ ठहरे थे। आज भी वहाँ की वादियाँ उनके आगमन की स्मृतियों से आलोकित प्रतीत होती हैं।
गंगटोक से चुंगतांग तक पक्की सड़क जाती है, किंतु इतिहास के पथ पत्थरों पर अंकित रहते हैं। चुंगतांग, जिसे स्थानीय लोग ‘नानक-तांग’ भी कहते हैं; वहीं वह स्थान है जहाँ गुरु साहिब ने दो रातों तक विश्राम किया। घाटी के मध्य एक विशाल शिला है, लगभग तीस फुट ऊँची और दो सौ फुट परिधि वाली; जिस पर श्री गुरु नानक देव साहिब जी के चरण-चिह्न अंकित माने जाते हैं। उस शिला के चारों ओर श्रद्धा की परिधि में चार फुट ऊँची दीवार निर्मित है, मानो समय स्वयं उस स्मृति की रक्षा कर रहा हो।
लोक-परंपरा में एक कथा प्रचलित है कि जब गुरु साहिब वहाँ पहुँचे, तो एक राक्षस ने मार्ग अवरुद्ध किया। गुरु पातशाह ने अपनी खुँडी (छड़ी) के संकेत से उसे हट जाने का निर्देश दिया। क्रोध से उन्मत्त होकर उसने पहाड़ी से एक विशाल शिला गुरु की ओर लुढ़का दी। भाई मरदाना क्षण भर के लिए विचलित हुए, पर गुरु साहिब ने मुस्कराकर कहा- “मरदाने, घबराओ मत; यह तो बैठने के लिए आसन आ रहा है।” शिला उनके चरणों में आकर ठहर गई। जब गुरु साहिब उस पर विराजमान हुए, तो वह शिला कोमल हो उठी और उस पर उनके चरण-चिह्न अंकित हो गए, जो आज भी श्रद्धा का केंद्र हैं।
वहाँ कीर्तन की ध्वनि गूँजी तो स्थानीय लोग एकत्र हुए। उन्होंने गुरु साहिब का सत्कार किया और भेंट अर्पित की। भाई मरदाना ने निर्मल जल की कामना की, जबकि घाटी की नदी का जल गंदला था। तब गुरु साहिब ने उसी शिला से एक स्वच्छ झरना प्रकट किया; करुणा और कृपा का प्रतीक। कहा जाता है कि वे अपने साथ चावल और केले लाए थे, ऐसी फसलें जो उस क्षेत्र में पहले नहीं उगती थीं। उन्होंने लोगों को उनके बीज दिए और बोने का मार्ग बताया। आज चुंगतांग और उसके आसपास के विस्तृत क्षेत्र में चावल और केले की समृद्ध खेती होती है। स्थानीय परंपरा मानती है कि यह समृद्धि श्री गुरु नानक देव साहिब जी की ही देन है।
हिमालय की वादियों में आज भी जब शीतल पवन बहती है, तो लगता है मानो वह ‘एक ओंकार’ की ध्वनि लेकर चल रही हो। नानक लामा, एक नाम, जो सीमाओं से परे, संस्कृति से ऊपर, मानवता के अंतर्मन में गूँजता है।
हिमालय की विराट श्रृंखलाओं के मध्य, एवरेस्ट की ओर अग्रसर अंतिम पड़ाव के समीप ‘थांग बोचे’ नामक एक प्राचीन मठ स्थित है। हिम-पर्वतों की गोद में अवस्थित यह तिब्बती लामा मठ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं अपितु एक मौन इतिहास का भंडार है। यहाँ श्री गुरु नानक देव साहिब जी से संबंधित आलेख, चित्र और पांडुलिपियाँ अत्यंत श्रद्धा से सुरक्षित रखी गई हैं। इस मठ के लामा का दृढ़ विश्वास है कि इनमें से कुछ आलेख स्वयं श्री गुरु नानक देव साहिब जी की हस्तलिखित रचनाएँ हैं; एक ऐसा विश्वास, जो श्रद्धा और आध्यात्मिक संबंध की गहराई को प्रकट करता है।
एवरेस्ट अभियान पर जाने वाली टीम के सदस्यों को इन हस्तलिखित ग्रंथों के दर्शन कराए जाते हैं। एवरेस्ट अभियान के कई सदस्यों ने अपने संस्मरण में लिखा है कि इन अमूल्य पांडुलिपियों को बहुमूल्य वस्त्रों में लपेटकर अलमारियों के खानों में अत्यंत आदर और सावधानी से रखा गया है। उस मंदिर का वातावरण शांत, गंभीर और रहस्यमय है, मानो हिमालय की निस्तब्धता स्वयं वहाँ साधना में लीन हो।
दीवारों पर रंगीन चित्र सजे है, छत पर पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए है। विविध धातुओं में निर्मित अनेक मूर्तियां यहां विराजमान है। अलमारियों में हस्तलिखित पांडुलिपियों का भंडार है। यह मूर्तियां उस मठ के दिवंगत लामाओं की स्मृति में स्थापित है। उन्हीं में से एक मूर्ति ‘रिपंचो गुरु नानक’ की भी थी। तिब्बती परंपरा में श्री गुरु नानक देव साहिब जी को ‘रिनपोचे गुरु’ अर्थात् ‘अनमोल आचार्य’ कहा जाता है। तिब्बत में उन्हें ‘गुरु रिपंचो’ के रूप में श्रद्धा पूर्वक पूजा जाता है।
तिब्बती ग्रंथों में श्री गुरु नानक देव साहिब जी के विषय में उल्लेख मिलता है- “महान सिंधाचार्य, जिन्होंने बौद्ध धर्म को तिब्बत और चीन में प्रसारित किया, गुरु रिपंचो अर्थात् अनमोल शिक्षक हैं। उनका आध्यात्मिक जन्म अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पावन सरोवर से संबंधित है।” इसी श्रद्धा के कारण तिब्बत का एक संप्रदाय कठिन यात्राएँ कर अमृतसर के पवित्र सरोवर में स्नान करने पहुँचता रहा है। तिब्बती उन्हें महात्मा बुद्ध का आठवाँ अवतार मानते हैं और श्री हरिमंदिर साहिब के सरोवर को अपने इष्ट का आध्यात्मिक जन्मदाता समझते हैं। यह श्रद्धा केवल कथा नहीं अपितु संस्कृतियों के अदृश्य सेतु का प्रमाण है।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. त्रिलोक सिंह जी ने अपनी कृति जीवन चरित्र गुरु नानक देव में एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं कि सन 1960 ई. में श्री हरमंदिर साहिब की परिक्रमा में उन्होंने कुछ तिब्बतियों को बैठे देखा। उनमें से एक किसी हस्तलिखित ग्रंथ का पाठ कर रहा था। भाषा का अंतर होने के कारण प्रत्यक्ष संवाद संभव न था, पर एक अन्य तिब्बती, जो अंग्रेज़ी जानता था, ने बताया कि उस ग्रंथ में दसों गुरु साहिबानों की महिमा और इतिहास अंकित है। उसने यह भी स्पष्ट किया कि तिब्बती भाषा में प्रत्येक गुरु का मूल नाम और गुण-प्रकटाव नाम सुरक्षित है, मानो हिमालय की स्मृति में गुरु परंपरा का संपूर्ण वृत्तांत अंकित हो।
इतिहासकार डॉ. त्रिलोक सिंह जी ने उस तिब्बती से वह पोथी खरीदने का प्रयास किया, पर वह पाँच सौ रुपये में भी उसे देने को तैयार न हुआ। फटे-पुराने वस्त्र पहने उस तिब्बती ने सहज पर दृढ़ स्वर में कहा- “यह पोथी मेरे लिए मेरी जिंदगी जितनी ही कीमती है।” उस क्षण यह अनुभव हुआ कि हरमंदिर साहिब की परिक्रमा में भव्य परिधान और शाही ठाठ से विचरते लोगों की अपेक्षा वह साधारण वेशधारी तिब्बती ही वास्तविक अर्थों में अधिक समृद्ध और स्वाभिमानी था। उसके लिए श्रद्धा का मूल्य धन से कहीं ऊपर था।
उस घटना ने अंतर्मन को झकझोर दिया। पाँच सौ रुपये की पेशकश केवल एक व्यापारिक प्रस्ताव न था, वह अनजाने में श्रद्धा की गरिमा को मापने का प्रयास था। उस क्षण यह अनुभूति हुई कि उस तिब्बती और उसके इष्ट के प्रति अनजाने में अनादर हो गया।
यह भी एक कटु सत्य है कि सिख इतिहास के लेखन में अनेक बार ऐसी बातों को नकार दिया गया, जिन्हें तत्कालीन विद्वान समझ न सके। जो तथ्य अनुभव या परंपरा के स्तर पर विद्यमान थे, उन्हें “वैज्ञानिक प्रमाण” के अभाव में अस्वीकार कर दिया गया। पाश्चात्य विद्वानों ने सिख इतिहास और गुरबाणी के विषय में कई भ्रांतियाँ उत्पन्न कीं, किंतु दुर्भाग्य से हमारे अपने कुछ विद्वानों ने भी प्रगतिशीलता के नाम पर अनेक मूल्यों को संदेह के घेरे में डाल दिया। इतिहास का संतुलित अध्ययन श्रद्धा और विवेक दोनों की माँग करता है।
भूटान की पारो घाटी में एक ऊँची पहाड़ी की ढलान पर स्थित एक मठ, जिसे ‘शेर का आल्हना’ कहा जाता है, गुरु रिपंचो नानक का बैकुंठ-भवन माना जाता है। संभव है कि वहाँ पूर्व से कोई मठ रहा हो, पर स्थानीय परंपरा यह मानती है कि श्री गुरु नानक देव साहिब जी वहाँ ठहरे और लामाओं के साथ ज्ञान-विमर्श किया। यह संवाद ही उनके जीवन का सार था, सीमाओं को लाँघते हुए विचारों का आदान-प्रदान।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी तिब्बत के अनेक स्थलों तक पहुँचे। उनके उपदेश और इतिहास आज भी किसी न किसी रूप में वहाँ के लोगों के हृदयों में सुरक्षित हैं। उत्तर-पूर्वी भारत और हिमालयी अंचल में उनकी स्मृति को अत्यंत सम्मान के साथ सँजोया गया है। वहाँ की संस्कृति, लोक कथाओं और धार्मिक प्रतीकों में कहीं-न-कहीं श्री गुरु नानक देव साहिब जी की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। यह प्रमाण है कि सत्य का संदेश भूगोल से बँधा नहीं होता; वह पर्वतों को पार कर मानवता के अंतरतम तक पहुँचता है।
आभार-
उपयुक्त आलेख गुरुमुखी के लेखक सरदार हरविंदर सिंह खालसा जी के आलेख से प्रेरित है, मैं उनके प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। तिब्बत और पूर्वोत्तर भारत में श्री गुरु नानक साहिब जी की स्मृतियों को उजागर करने वाला उनका शोधपरक और प्रेरणादायी लेखन इस विषय पर गंभीर चिंतन का मार्ग प्रशस्त करता है। उनके अध्ययन, समर्पण और पंथनिष्ठ दृष्टिकोण को विनम्र प्रणाम। उनसे ईमेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।
चित्र स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख से प्राप्त।
–सादर आभार सहित-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’


