श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी और निष्काम सेवा

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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चलते–चलते. . . .
(टीम खोज–विचार की पहेल)

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी और निष्काम सेवा

निष्काम सेवा सिख धर्म का प्रमुख अंग है, सद्विचारों और उच्च आचरण के पुरुष निष्काम सेवा में समर्पित हो सकते हैं। मानव जीवन के कल्याण हेतु की गई निष्काम सेवा ही प्रभु–परमेश्वर को पर्वान होती है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ का फरमान है कि

विचि दुनीआ सेव कमाईऐ॥

ता दरगह बैसणु पाईऐ॥

(अंग क्रमांक 26)

अर्थात् इस दुनिया में विचरण करते हुए यदि इंसान निष्काम सेवा की कमाई करता है तो ही उसे प्रभु के दरबार (सचखंड) में आसीन होने का अधिकार प्राप्त होता है।

निष्काम सेवा एक ऐसा कर्म है जिससे शरीर और मन दोनों ही पवित्र होते हैं, सिख धर्म में भक्ति (सिमरन) और निष्काम सेवा को मुक्ति का मार्ग माना गया है। निष्काम सेवा को आत्मिक उन्नति की प्रथम सीढ़ी (नसैनी) के रूप में निरूपित किया जा सकता है, निष्काम सेवा से ही आनंद रूपी रस में सराबोर होकर जीवन को सफल किया जा सकता है। सिख धर्म में सबसे ऊंची और पवित्र निष्काम सेवा गुरुओं की, साध–संगत की और उस अकाल पुरख की मानी जाती है। सम्मान के जज्बे से माता–पिता की, की गई सेवा मानवीय फ़र्ज है। लालच और स्वयं के फायदे के लिए की गई सेवा नौकरी या चाकरी होती है। ऐसी सेवाओं से केवल व्यक्तिगत स्वार्थ साध्य होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में उस अकाल पुरख की ज्योत का अस्तित्व स्वीकार करके की गई निष्काम सेवा ही आदर्श निष्काम सेवा है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ का फरमान है कि

कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु॥

रामु जु दाता मुकति को संतु जपावै नामु॥

(अंग क्रमांक 1373)

अर्थात् कबीर जी उपदेशित करते हैं की, सेवा के लिए दो ही भले हैं, एक संत और एक राम! राम का नाम मुक्ति प्रदान करने वाला है और संत इस मुक्तिदाता का नाम जपवाता है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ का फरमान है कि—

गुर सेवा ते भगति कमाई॥

तब इह मानस देही पाई॥

    (अंग क्रमांक 1159)

अर्थात् भक्ति से गुरु की निष्काम में समर्पित हो तो ही सही अर्थों में मानव देह प्राप्त होती है, इसके बिना जन्म लेकर भी मानवता का भाव प्राप्त नहीं होता है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ का फरमान है कि—

सतिगुर की सेवा सफलु है जे को करे चितु लाइ॥

मनि चिंदिआ फलु पावणा हउमै विचहु जाइ॥

बंधन तोड़ै मुकति होइ सचे रहै समाइ॥

इसु जग महि नामु अलभु है गुरमुखि वसै मनि आइ॥

नानक जो गुरु सेवहि आपणा हउ तिन बलिहारै जाउ॥

(अंग क्रमांक 644)

अर्थात् सतगुरु की सेवा तो ही सफल है जब कोई इसे मन लगाकर करता है, जिससे कि मनचाहा फल प्राप्त होता है और अंतर्मन के अहंकार का समूल नष्ट हो जाता है। ऐसे पुरुष बंधनों को तोड़कर मोक्ष की प्राप्ति करते हैं और उनका जीवन सच्चाई में ही निहित रहता है। इस जग में उस अकाल पुरख का नाम अत्यंत दुर्लभ है। यह नाम गुरमुखों के चित् में ही स्थिर होता है। है नानक! जो अपने गुरु की निष्काम सेवा करता है मैं उस पर कुर्बान जाता हूं।

गुरुवाणी का उपरोक्त अधोरेखित पद्य (सबद) से स्पष्ट है कि सिख धर्म में निष्काम सेवा के द्वारा नाम/सिमरन की प्राप्ति का मार्ग दर्शाया गया है।

निष्काम सेवा से ही जन्म–मरण के बंधन कट जाते हैं और मानवीय जीवन सफल होता है। निष्काम सेवा से ही मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और अंतरात्मा उस प्रभु के नाम में लीन हो जाती है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की वाणी का फरमान है कि

करोड़ि हसत तेरी टहल कमावहि चरण चलहि प्रभ मारगि राम॥

भव सागार नाव हरि सेवा जो चड़ै तिसु तारगि राम॥

(अंग क्रमांक 781)

अर्थात् हे प्रभु मेरे करोड़ों हाथ हो और वह तेरी निष्काम सेवा करें, मेरे करोड़ों पैर हो जाए जो तेरे बताए हुए मार्ग पर ही चलें, इस कलयुग रूपी भवसागर में से पार होने के लिए हरि की उपासना एक नाव है और जो इस नाव पर चढ़ता है वह पार हो जाता है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की वाणी का फरमान है कि—

सेवा करी जे किछु होवै अपणा जीउ पींडु तुमारा॥

(अंग क्रमांक 635)

अर्थात् हे प्रभु यदि मेरा कुछ अपना हो तो ही मैं तेरी सेवा करूं, मेरी आत्मा और शरीर तुम्हारी देन है, जब कोई सच्चा सेवादार इस आदर्श को समझ लेता है तो वह उसके अहंकार और स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रभु–परमेश्वर और इंसानियत की निष्काम सेवा करता है। सभी इंसान उस प्रभु परमेश्वर की देन है, इंसानियत की सेवा ही निष्काम सेवा है।

“मानवता की सेवा करना ही प्रभु–परमेश्वर की सेवा करना है”।

सतगुरु की इन्हीं शिक्षाओं के कारण इस दुनिया में ऐसे कई महापुरुषों और गुरु सिखों ने जन्म लिया है, उन्होंने आत्मिक तौर पर अत्यंत ऊंचाई को प्राप्त कर नफरत और बुराई को छोड़कर, प्रभु की सेवा समझकर, इंसानियत और मानव कल्याण के लिए निष्काम सेवाएं समाज में प्रदान की हैं।

निष्काम सेवा का सर्वोत्तम–स्वर्णिम इतिहास ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ में भाई कन्हैया जी का है। गुरु वाणी की शिक्षाओं को अपनी अंतरात्मा में उतारकर सन् 1704 ई. में भाई कन्हैया जी पानी के ‘मश्क’ भरकर मैदान–ए–ग़िरफ्तार में जाकर सभी घायलों को ‘मश्क’ का ठंडा पानी पिलाते थे। इस निष्काम सेवा को ‘भाई कन्हैया जी’ बिना किसी भेदभाव के लगातार करते रहते थे। आप जी दुश्मनों के घायल सैनिकों को भी बिना किसी भेदभाव के पानी पिलाते थे। जिससे उन घायल सैनिकों को नवजीवन मिल जाता था।

कुछ सिख सैनिकों से ‘भाई कन्हैया जी’ की सेवा बर्दाश्त नहीं हुई और उन्होंने ‘दशमेश पिता ‘श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी’ को ‘भाई कन्हैया जी’ की सख्त शिकायत कर दी थी और कहा कि ‘भाई कन्हैया जी’ शत्रु सैनिकों को पानी पिला कर फिर से हमारे सामने युद्ध के लिए तैयार कर देते हैं। दशमेश पिता की और से ‘भाई कन्हैया जी’ को बुलाया गया। समक्ष हाजिर होने के पश्चात जब ‘भाई कन्हैया जी’ से पूछा गया कि आप यह क्या कर रहे हो? आप शत्रु सैनिकों को भी पानी पिला रहे हो,ऐसा क्यों? सुनकर ‘भाई कन्हैया जी’ ने बड़े ही निर्वैर भाव से उत्तर दिया कि ‘पातशाह जी’ मुझे तो हर घायल सैनिक में आपकी सूरत नजर आती है।

मैं ता जत देखा तत् तू॥

अर्थात् मुझे तो हर घायल सैनिक में ईश्वर नजर आता है। हर घायल सैनिक में ‘महाराज जी’ मुझे तो आप ही के दर्शन होते हैं। इसलिए मेरे लिए ‘ना कोई बेरी है और ना ही कोई बेगाना है’।

इस प्रसंग को भाई वीर सिंह जी ने अपनी रचना में बहुत ही अच्छी तरह से स्पष्ट किया है–

तेनु पिया पिलावां पानी मैनु होर नजर ना आई।

तुरक अतुरक ना कोई दिसदा तु है सभ नी थाई॥

अर्थात मैं तो केवल आप ही को पानी पिला रहा था। मुझे तो अपना–पराया कोई नहीं दिखा। मुझे तो केवल आप ही आप नजर आए सतगुरु जी। यह सुनकर ‘दशमेश पिता जी’ ने मुस्कुराकर ‘भाई कन्हैया जी’ को गले लगा लिया और भाई कन्हैया जी’ को मलहम पट्टी भी दी और ज़रूरत अनुसार मलहम पट्टी करने का सुझाव भी दिया। साथ ही कहा कि ‘भाई कन्हैया जी’ आपकी सेवा बहुत ही महान है।

इतिहास के इस प्रसंग अनुसार सन् 1863 ई. से 149 वर्ष पूर्व सन् 1704 ई. में ही रेड क्रॉस सोसाइटी का जन्म ‘भाई कन्हैया जी’ की निष्काम सेवा के द्वारा हो चुका था। आज पूरी दुनिया में जहां रेड क्रॉस सोसाइटी कार्य कर रही है वह हमें निश्चित रूप से इंसानियत के रहनुमा निष्काम सेवादार ‘भाई कन्हैया जी’ को भी याद रखना होगा। भाई कन्हैया जी की इन निष्काम सेवा के कारण ही भारत सरकार की और से सन् 1998 ई. में भाई कन्हैया जी की याद में एक ‘डाक टिकट’ भी जारी किया गया था।

इसी तरह का एक और उदाहरण सिखों स्वर्णीम इतिहास में अंकित है जब शेर–ए–पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी के देहांत के पश्चात सिख राज अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था तो उस समय चुना मंडी लाहौर के निवासी बाबा ख़ुदा सिंह जी ने भी अपनी निष्काम सेवाओं से ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ का सम्मान बढ़ाया था, उनके संबंध में इतिहास में लिखित है कि, किसी समय अंधेरी रात में जब आप प्रभु स्मरण में लीन थे तो किसी दुखियारी महिला की अत्यंत हृदय विदारक रोने की आवाज सुनाई दी और वह महिला दर्द से कराह रही थी आप भी उस आवाज को सुनकर एक टूटी–फूटी झोपड़ी में पहुंचे और देखते हैं कि उस झोपड़ी में निवास करने वाली महिला अपने तन पर हुए फोड़े के दर्द से तड़प रही थी, आप जी ने उस महिला की पीढ़ा को दूर करने हेतु अपने मुंह से उस फोड़े के ज़हररूपी मवाद को चूस–चूस कर खींच लिया था एवं उस महिला को अत्यंत पीड़ादाई अवस्था से मुक्ति प्रदान करवाई थी। जब उस महिला के पति ने नतमस्तक होकर कहा कि आपने हम गरीबों पर बड़ी कृपा की है तो बाबा ख़ुदा सिंह जी ने विनम्रता से कहा था कि यह ‘गुरु का हुक्म है’| ऐसी कई निष्काम सेवाओं को ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ के गुरु सिख सेवादार लगातार अंजाम दे रहे हैं।

 धन्य है, गुरु के सिख! धन्य है, गुरु पंथ ख़ालसा! और धन्य है, गुरु के सिखों के द्वारा की गई निष्काम सेवा!

नोट– 1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।

2. गुरुवाणी का हिंदी अनुवाद गुरुवाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।

साभार— लेख में प्रकाशित गुरुवाणी के पद्यों की जानकारी और विश्लेषण सरदार गुरदयाल सिंह जी (खोज–विचार टीम के प्रमुख सेवादार) के द्वारा प्राप्त की गई है।

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