दिपावली शुभचिंतन!

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ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥

प्रासंगिक—

(टीम खोज–विचार की पहल)

दिपावली शुभचिंतन

दिवाली के दिवस पर हरमंदिर साहिब ‘श्री दरबार साहिब जी’ अमृतसर में और पूरे विश्व के लगभग समस्त गुरुद्वारों में ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ के वेदव्यास कहे जाने वाले भाई ‘गुरदास जी’ की 19वी वारां की 6 वीं पौउड़ी (पद्य) का कीर्तन करते हुए एक सबद (पद्य) का गायन अवश्य किया जाता है। इस पौउढ़ी (पद्य) की प्रथम पंक्ति इस तरह से है—

दिवाली की रात दीवे बालीयनि॥

परंतु इन पंक्तियों के अर्थ रागी सिंह (कीर्तन कार) दीवान में लगभग ना के बराबर बताते हैं। उपस्थित संगत केवल उपरोक्त एक ही पंक्ति को याद रखती है और इसका अर्थ केवल दिवाली की रात में दियों के प्रकाश से ही संबंधित किया जाता है।

उपरोक्त पौउढ़ी इस तरह से है—

6:चलण जुगत

दिवाली दी राति दीवे बालीअनि॥

तारे जाति सनाति अंबरि भालीअनि॥

फुलाँ दी बागति चुणि चुणि चालीअनि॥

तीरथ जाती जाति नैण निहालीअनि॥

हरिचंदउरी झाति बसाइ उचालीअनि॥

गुरमुखि सुख फल दाति सबदि समालीअनि॥

अर्थात् दिवाली के दिवस पर लोग दियों का प्रकाश करते हैं परंतु इन दीयों की रोशनी कुछ समय के लिए ही होती है। रात में तारे साफ दिखाई देते हैं परंतु दिन निकलते ही अलिप्त हो जाते हैं। बुटों पर फूल खिलते हैं परंतु फुल हमेशा बुटों साथ में लगे नहीं रहते हैं। तीर्थ जाने वाले तीर्थ यात्री दिखाई देते हैं परंतु तीर्थों पर कोई स्थाई निवास नहीं करता है। आकाश में बादलों के महल दिखाई तो देते हैं परंतु वह नजरों का भ्रम है। जो गुरमुख होते हैं वह इस संसार की नश्वरता से भली भांति परिचित हो जाते हैं परंतु वह इस नश्वर संसार के भ्रमों से स्वयं को अलग कर अपने जीवन को संभाल लेते हैं।

इससे हम समझ सकते हैं कि इस पौउढ़ी (पद्य)का भाव क्या है? और हम इस पौउढ़ी (पद्य) की पहली पंक्ति को ही अपने से अर्थ करके कुछ और करते हैं।

संगत जी गुरुवाणी को समझकर, ग्रहण करो और ज्ञान का दीया सदैव अपने अंतर्मन में प्रकाशित करो। केवल सांसारिक दीये प्रकाश करने तक की दिवाली को सीमित ना रखो।

साथ ही ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ में दिपावली के इन दिवसों का बडा़ ही विशेष महत्व है। कारण 6वीं पातशाही ‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ ने इन्ही दिनों में अपने साथ पुरे देश के 52 राजाओं को जहांगीर की क़ैद से ग्वालियर के किले से आज़ाद करा कर स्वयं के निरीक्षण में प्रत्येक राजा को सुरक्षित उनकी रियासतों में पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया था और ‘श्री दरबार साहिब जी’ अमृतसर पहुंचे थे। इसलिये सिख धर्म के अनुयायी इस दिवस को ‘दाता बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में पूरे विश्व में हर्षोल्लास के साथ सेवा–सुमिरन और गुरुवाणी का पठन कर दीप मालाएं प्रज्ज्वलित कर मनाते है।

इस पूरे देश के 52 राजाओं को सही सलामत जहांगीर की क़ैद से आज़ाद करवाने वाले ऐसे महान सतगुरु ‘श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी’ को सादर नमन एवं ‘टीम खोज-विचार’ की और से सभी गुरु रूप संगत को दीपावली की हार्दिक बधाई।

नोट 1. ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।

2.गुरुवाणी का हिंदी अनुवाद गुरुवाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।

साभार लेख में प्रकाशित गुरुवाणी के पद्यो की जानकारी और विश्लेषण सरदार गुरदयाल सिंह जी (खोज–विचार टीम के प्रमुख सेवादार) के द्वारा प्राप्त की गई है।

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श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की गुरता गद्दी दिवस पर विशेष–

KHOJ VICHAR CHANNLE


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