दक्खिनी (दक्षिणी) सिख : हजूरी संगत

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 दक्खिनी (दक्षिणी) सिख : हजूरी संगत

“दक्खिनी” शब्द, जिसे सिख समाज के कुछ वर्गों द्वारा कभी-कभी उपहास के भाव से प्रयुक्त किया जाता है, अपने वास्तविक अर्थ में केवल उस भौगोलिक क्षेत्र की ओर संकेत करता है, जहाँ ये सिख निवास करते हैं। उर्दू भाषा में “दक्षिण” का तात्पर्य दक्षिण दिशा से है। अविभाजित भारतीय उपमहाद्वीप में कभी दो हैदराबाद नगर अस्तित्व में थे; एक पश्चिमी सिंध प्रांत में और दूसरा दक्षिणी हैदराबाद प्रांत में। उस काल की प्रचलित शब्दावली में इन्हें क्रमशः “हैदराबाद सिंध” और “हैदराबाद दक्षिण” कहा जाता था। आज का भारतीय हैदराबाद नगर अतीत में निज़ाम हैदराबाद की राजधानी हुआ करता था।

हैदराबाद के इस दक्षिणी भूभाग में बसने वाले लोगों को “दक्खिनी” कहा जाने लगा। इसी कारण वहाँ रहने वाले सिख “दक्खिनी सिख”, पठान “दक्खिनी पठान” तथा अन्य समुदाय भी इसी भौगोलिक पहचान से पहचाने जाने लगे। यह स्पष्ट है कि यह पहचान किसी धार्मिक या नस्लीय भिन्नता का द्योतक नहीं, बल्कि मात्र क्षेत्रीय परिचय है। इतिहास में यह वर्णन मिलता है कि जब श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी सचखंड गमन की तैयारी में थे, तब दक्खिनी सिखों ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता और करुण भाव से निवेदन किया कि- महाराज जी! आपके बिना हम कैसे रह पाएँगे? तब गुरु साहिब जी ने उन्हें पावन वचन देकर आश्वस्त किया कि वे सदा उनके हज़ूर उपस्थित रहेंगे; इसी दिव्य आश्वासन के कारण दक्खिनी सिख श्रद्धा और सम्मान के साथ “हजूरी सिख” कहे जाने लगे। गुरु पंथ खालसा के अनुयायी इन सिखों को स्नेहपूर्वक “हजूरी संगत” कहकर संबोधित करते हैं, जो उनके प्रति आदर और आत्मीयता का प्रतीक है।

जो व्यक्ति, विद्वान अथवा कोई धार्मिक संस्था प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन प्रवासी सिखों की पहचान को कमतर आँकने का प्रयास करती है और केवल उनके पहनावे या भाषा को पंजाबी सिखों से भिन्न बताकर उन्हें सिख कौम और परंपरा से अलग सिद्ध करना चाहती है, वह वस्तुतः अन्याय और भेदभाव की राह पर चलती है। गुरु पंथ खालसा में इन सिख अनुयायियों का अपना विशिष्ट स्थान और गौरवपूर्ण रुतबा है। संपूर्ण विश्व में गुरमत मर्यादा के पूर्ण और निष्ठापूर्ण पालन में दक्खिनी सिखों का योगदान निस्संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण और सर्वोपरि रहा है।

इतिहासकारों की उपेक्षा

प्राचीन और आधुनिक दोनों ही कालखंडों के सिख तथा गैर-सिख इतिहासकारों ने भारतीय उपमहाद्वीप के इस क्षेत्र में सिख सेना की उपस्थिति के उस अद्वितीय और विलक्षण इतिहास को प्रायः उपेक्षित ही रखा है, जब सिख फौज मित्रता और शांति की भावना से प्रेरित होकर वहाँ पहुँची थी। किसी सिख शासक द्वारा किसी मुस्लिम राजा की आंतरिक सुरक्षा सुदृढ़ करने के उद्देश्य से, हज़ारों किलोमीटर दूर से सैनिकों को भेजना; जहाँ न तो कोई राजनीतिक विवशता थी और न ही किसी प्रकार का ऋण-प्रतिदान; अपने आप में एक असाधारण और अनुपम उदाहरण था। उस युग में यातायात और संचार के साधन भी अत्यंत सीमित और कठिन थे।

इस मानवीय, उदात्त और आदर्शवादी प्रयास को इतिहासकारों ने यहाँ तक कि सिख इतिहासकारों ने भी वह मान्यता नहीं दी, जिसका यह वास्तव में अधिकारी था। निज़ाम के आमंत्रण पर शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह की सिख सेना का दक्षिण हैदराबाद पहुँचना वस्तुतः आधुनिक युग की “पीस-कीपिंग फोर्स” जैसा एक अनुपम और दूरदर्शी कदम था। निश्चित ही यह उन्नीसवीं शताब्दी की एक सच्ची “शांति सेना” का स्वरूप थी। आज के दक्खिनी सिख, इतिहास के इसी उपेक्षित और अनदेखे पक्ष की जीवंत साक्षी के रूप में हमारे सामने उपस्थित हैं।

दक्षिण में सिख

ऐतिहासिक चारमीनार का निर्माण सन 1591 ईस्वी में हुआ, किंतु सिख समुदाय हैदराबाद नगर का उससे भी पूर्वकाल से निवासी रहा है। लगभग सन 1512 ईस्वी के आसपास, श्री गुरु नानक साहिब जी नांदेड़ और बीदर से होते हुए हैदराबाद नगर की स्थापना से पूर्व, गोलकुंडा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और रामेश्वरम की यात्रा करते हुए श्रीलंका पहुँचे।

श्री गुरु नानक साहिब जी ने अपने प्रवास के दौरान मानवतावाद और अध्यात्म के संदेश का व्यापक प्रचार – प्रसार किया तथा इन नगरों में अपने अनेक अनुयायियों को स्थापित किया। उन्होंने न तो उन्हें किसी भिन्न धार्मिक पहचान में बाँधा और न ही किसी कठोर अनुशासन की बेड़ियों में जकड़ा। परिणामस्वरूप समय के प्रवाह में अनेक अनुयायी पुनः अपने हिंदू या मुस्लिम धर्मों में लौट गए। फिर भी कुछ ऐसे विरले लोग थे, जिन्होंने गुरु की शिक्षाओं को हृदयंगम कर जीवन भर उनका पालन किया। इसका एक उत्कृष्ट और प्रेरक उदाहरण बीदर निवासी भाई साहिब सिंह हैं।

बीदर नगर, जो आज कर्नाटक राज्य में स्थित है और हैदराबाद से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर है, पाँच प्यारों में से एक भाई साहिब सिंह का निवास स्थान बीदर है। वे सन 1699 ईस्वी में श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी द्वारा अमृत पान करने वाले सिख कौम के प्रथम पाँच प्यारों में सम्मिलित थे।

करुणा, कलम और कृपाण के अद्भुत समन्वय के प्रतीक, दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी, हैदराबाद से लगभग 280 किलोमीटर दूर नांदेड़ (अब अबचल नगर श्री हजूर साहिब जी) में दीर्घकाल तक ठहरे और सन 1708 ईस्वी में वहीं उन्होंने अकाल चलाना कर, ब्रह्मलीन होना स्वीकार किया। इस अवधि के दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने अमृत पान कर सिख धर्म को अंगीकार किया, जिससे दक्षिण में सिख परंपरा की जड़ें और भी अधिक सुदृढ़ हुईं।

सिख फ़ौज को बुलावा : दक्खन में खालसा की शौर्य गाथा और इतिहास आशा सिंह बाग – शहीदां सिंह स्थान

दक्षिण भारत की हैदराबाद रियासत का प्रशासनिक, सैन्य और राजस्व इतिहास उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अनेक आंतरिक चुनौतियों से घिरा हुआ था। यद्यपि हैदराबाद पर तीसरे निज़ाम नवाब सिकंदर जहान का शासनकाल (सन 1903 ई. – सन 1929 ई. तक) प्रशासनिक दृष्टि से सुव्यवस्थित माना जाता है, परंतु उससे पूर्व के दशकों में विशेषतः चौथे निज़ाम आसिफ़ जाह नासिर-उद-दौला (सन 1830 ई. – सन 1857 ई. तक) के समय में राज्य को कर-वसूली, सुरक्षा और विद्रोह की गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। उस काल में हैदराबाद राज्य सोलह जिलों में विभक्त था; वर्तमान कर्नाटक के कुछ भूभाग तथा नांदेड़ (अब अबचल नगर श्री हजूर साहिब जी) जैसे पवित्र सिख तीर्थस्थल भी निज़ामी प्रशासन के अंतर्गत आते थे। महाराष्ट्र के सीमावर्ती अंचलों और बीदर–मालिया क्षेत्र में कर-वसूली की ज़िम्मेदारी जागीरदारों, देशमुखों और संस्थागत प्रभुत्वशाली वर्गों पर थी, जिन्हें इसके प्रतिफल में विशाल जागीरें प्रदान की गई थीं, शर्त यह कि निर्धारित कर के स्वरूप में जमा अंश राजकोष में जमा होगा, जिससे किलों और सेना का व्यय चल सके।

लगभग सन् 1830 ई. के आसपास यह व्यवस्था चरमराने लगी। अनेक जागीरदारों ने न केवल कर का लेखा – जोखा देना टालना आरंभ किया, बल्कि खुले विद्रोह का मार्ग भी अपनाया। स्थिति को संभालने हेतु अरब देशों से अरब सैनिक, अफ़्रीका से सिद्दी तथा उत्तर भारत से राजपूत, रोहिल्ले और पठान सैनिकों की भर्ती की गई; परंतु कर वसूली और विद्रोह के दमन की यह चुनौती उनसे भी पूरी न हो सकी। ऐसे संकट-काल में निज़ाम के प्रधान मंत्री तथा गुरु-घर के श्रद्धालु महाराजा चंदू लाल के परामर्श से, लाहौर दरबार की ओर दृष्टि गई, जहाँ ‘शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी’ की सुदृढ़ सैन्य प्रतिष्ठा समूचे उपमहाद्वीप में सुविख्यात थी।

दरबार – ए – लाहौर से सहायता का निवेदन

सन् 1822 ई. से सन 1843 ई. के मध्य निज़ाम की ओर से औपचारिक निवेदन-पत्रों और बहुमूल्य भेंटों के साथ दूत लाहौर भेजे गए। ऐतिहासिक स्रोत इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। सैयद मुहम्मद लतीफ़ ने अपनी पुस्तक पंजाब का इतिहास (सन 1889 ई.), पृष्ठ 443 पर लिखा है कि सन् 1826 ई. में हैदराबाद के दर्वेश मुहम्मद वकील उपहारों सहित लाहौर दरबार पहुँचे और ‘शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी’ तथा कुँवर खड़क सिंह के लिए भेंट प्रस्तुत की। इसी प्रकार प्रोफेसर सीता राम कोहली की पुस्तक महाराजा रणजीत सिंह (सन 1933 ई.), अध्याय 14 (पृष्ठ 267) में उल्लेख है कि सन् 1826 ई. में निज़ाम के राजदूत दर्वेश मोहउद्दीन ने चार उच्चकोटि के घोड़े, एक भव्य छत्र (कैनोपी), एक दोधारी तलवार, एक तोप और अनेक राइफ़लें भेंट कीं। महान लेखक मुल्कराज आनंद ने महाराजा रणजीत सिंह ऐज़ पैट्रन ऑफ आर्ट्स (सन 1981 ई.), पृष्ठ 39 पर अंकित किया है कि इन्हीं भेंटों में एक अत्यंत सुंदर चाँदनी भी थी, जिसकी भव्यता से प्रभावित होकर महाराजा ने उसे श्री हरमंदिर साहिब में अर्पित करने की घोषणा की, जहाँ वह विशेष अवसरों पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के ऊपर प्रयुक्त होती रही। यह सिख – मुस्लिम भाईचारे की अनुपम ऐतिहासिक साक्षी थी, जिसे जून 1984 ई. के दुर्भाग्यपूर्ण घटना क्रम में नष्ट कर दिया गया।

दक्षिण में सिख फ़ौज की पदयात्रा और छावनी

महाराजा रणजीत सिंह ने सहायता एवं निवेदन स्वीकार कर चौदह रिसालों के अंतर्गत लगभग 1400 लाहोरी सैनिकों को दक्षिण भेजा। चार महीनों की कठिन यात्रा पूर्ण कर यह दल हैदराबाद पहुँचा। उच्चाधिकारी अश्वारोही थे, जबकि अधिकांश सैनिक पैदल। प्रारंभिक तैनाती नगर के बाहर मीर आलम टैंक के निकट की गई पुराना पुल, अनंतगिरि, मूसी नदी और मीर आलम तालाब के मध्य लगभग दो सौ एकड़ भूमि पर। प्रत्येक रिसालदार ने अपने – अपने निशान साहिब स्थापित किए और सेना सहित वहीं निवास किया; इसी से यह क्षेत्र ‘सिखों की छावनी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इन चौदह रिसालों में सरदार आशा सिंह मंगल सिंह जी का नाम विशेष आदर से लिया जाता है। उन्होंने आदिलाबाद के नवाबों पर निर्णायक विजय प्राप्त कर पूर्ण लगान वसूल कर निज़ामशाही कोष में जमा कराया। उनकी योग्यता से प्रसन्न होकर राजा गोंदूलाल ने सिख छावनी में आठ एकड़ का सुंदर बाग़ भेंट किया। इसी बाग़ में सरदार आशा सिंह जी ने हैदराबाद का प्रथम गुरुद्वारा साहिब तथा एक विशाल बावली / कुआँ निर्मित करवाया था, जिसका उपयोग लाहोरी सैनिक अपनी दिनचर्या के लिए करते थे। (सन् 2014 ई. में इस बावली को बंद कर उसी स्थान पर एक विशाल हाल के निर्माण का निर्णय लिया गया।) सैनिक श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के दर्शन हेतु दरबार साहिब आते, सेवा में जुड़ते और गुरुद्वारे को एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र बनाते रहे; तभी से यह स्थल ‘आशा सिंह बाग’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

संघर्ष, शहादत और स्मृति

सन् 1839 ई. में ‘शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी’ के अकाल चलाना के पश्चात् पंजाब से वेतन और रसद की आपूर्ति रुक गई। उधर निज़ाम सरकार ने भी तन्ख़्वाह देने से इंकार कर दिया। रसद के अभाव में लाहोरी सेना ने इस अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार किया और भीषण संघर्ष छिड़ गया। इस पावन भूमि पर गुरु के अनेक प्यारे रणभूमि में शहीद हुए। उनकी अमर स्मृति में इस स्थान को ‘शहीदां सिंह स्थान’ के रूप में समर्पित कर स्मारक की स्थापना की गई। आगे चलकर सन् 1979 ई. में संत बाबा जोगिंदर सिंह जी मोनी (जत्थेदार: तख़्त श्री हज़ूर साहिब) ने यहाँ एक निशान साहिब स्थापित किया, जो आज भी श्रद्धा का केंद्र है।

स्थायी निवास और खालसा की अमिट पहचान

पंजाब की बदलती परिस्थितियों और सिख राज्य के पतन और अंग्रेज़ी पराधीनता के कारण लाहोरी सैनिक अपने वतन लौट न सके। निज़ाम ने उन्हें अपनी सेना में सम्मिलित कर सम्मानजनक पद, सुविधाएँ और प्रोत्साहन दिए तथा सिख छावनी की समस्त भूमि स्थायी निवास हेतु भेंट कर दी। इस प्रकार, पंजाब की धरती से हज़ारों मील दूर दक्षिण में गुरु के खालसों ने सेवा, साहस और शहादत के पथ पर चलते हुए अपनी विशिष्ट पहचान को अमिट रखा और गुरु पंथ खालसा की शान को अक्षुण्ण रखा। आज भी निज़ाम रियासत के अनेक गाँवों और नगरों से संगत इस पवित्र स्थल पर मनोकामना पूर्ति की अरदास करने आती है और शहीदी लंगरों की सेवा में सहभागी बनकर इस गौरवशाली परंपरा को जीवित रखती है।

दक्खिनी सिखों का सामाजिक जीवन

सिख फ़ौज ने वहीं बसने का निर्णय किया, क्योंकि वे अपनी पैतृक भूमि से अत्यंत दूर आ चुके थे। साथ ही उन्होंने स्थानीय महिलाओं से विवाह का मार्ग भी अपनाया। वे सभी सिख धर्म के मार्ग पर दृढ़ता से अग्रसर थे, किंतु स्थानीय महिलाएँ अमृत पान करने में संकोच करती थीं। सिख धर्म की मूल मान्यताओं और मूल्यों से किसी प्रकार का समझौता किए बिना एक ऐसा समाधान खोजा गया, जो आज तक भी अक्षुण्ण रूप से प्रचलित है।

चोंके चढ़ना

अमृतधारी से परिणय-बंधन अथवा आनंद कारज संपन्न होने के पश्चात पत्नी द्वारा रसोई में प्रवेश से पूर्व एक विशेष धार्मिक विधि संपन्न की जाती है। यही विधि प्रत्येक संतान के जन्म के पश्चात भी दोहराई जाती है। इस प्रक्रिया में एक अमृतधारी सिख द्वारा जपुजी साहिब का पाठ कर शुद्ध जल और पतासों को एक पात्र में कृपाण से मिलाकर अमृत तैयार किया जाता है। कड़ाह प्रसाद की तैयारी के उपरांत अरदास / प्रार्थना की जाती है और उसके पश्चात ही दुल्हन पत्नी रसोई में प्रवेश करती है। स्थानीय महिलाओं से विवाह कर दांपत्य जीवन का आरंभ इसी रस्म के बाद किया जाता रहा है। यह पूर्व-शर्त आज भी पूरी कठोरता के साथ लागू है। इस अमृत – रस्म के बिना आनंद कारज संपन्न नहीं किया जाता, चाहे विवाह अंतर्जातीय हो अथवा जाति – समुदाय के भीतर।

दक्खिनी सिखों का धार्मिक जीवन

सामान्यतः भाषा का संबंध धर्म से नहीं, अपितु भूगोल से होता है। पंजाबी भाषा के प्रयोग और अभ्यास के लिए अनुकूल वातावरण और अवसर उपलब्ध न होने के कारण दक्खिनी सिखों की स्थानीय भाषाओं- विशेषतः उर्दू से घनिष्ठता बनी, जो उस समय दक्षिण की राजकीय भाषा थी।

आज भी दक्खिनी पुरुष पाँचों ककार धारण करते हैं। उनकी स्त्रियाँ स्थानीय परिधान पहनती हैं और स्थानीय भाषाओं का प्रयोग करती हैं। समस्त दक्खिनी सिख गुरमत मर्यादाओं के मूल्यों का पालन करते हुए अमृतधारी, केसाधारी और कृपाणधारी हैं तथा अन्य समुदायों में अपनी धार्मिक आचरण शीलता के कारण विशेष सम्मान प्राप्त करते हैं।

मांसाहार के समय सिख रहित मर्यादा का पूर्ण ध्यान रखा जाता है और वे केवल झटका किया हुआ मांस ही ग्रहण करते हैं। दाढ़ी और मूँछों की किसी प्रकार की बेअदबी नहीं की जाती। सिख रहित मर्यादा के अनुसार मुस्लिम विधि से तैयार मांस का सेवन निषिद्ध है।

एक विशिष्ट घटना दक्खिनी सिखों के चरित्र की गहन समझ प्रदान करती है। नांदेड़ (अब अबचल नगर श्री हजूर साहिब जी) में एक अवसर पर कलेक्टर-तालुकदार ने डिविजनल कमिश्नर (सूबेदार) के लिए एक समारोह आयोजित किया और रागी सिंहों से फ़ारसी भाषा में गुरबाणी पाठ का अनुरोध किया। जब रागी- भाई तहल सिंह, भाई जगत सिंह और भाई सरदूल सिंह जी वहाँ पहुँचे, तो उन्हें फ़र्श पर बैठने को कहा गया, जबकि अधिकारी मंच पर कुर्सियों पर विराजमान थे। रागियों ने विनम्रतापूर्वक गुरबाणी गायन से इनकार कर दिया कारण इसे गुरबाणी की अवमानना माना गया।

कार्यक्रम में उपस्थित सभी वरिष्ठ अधिकारियों ने रागी सिंहों के इस निर्णय की सराहना की। सभी अधिकारी अपनी कुर्सियों से उतर आए और बड़े आदर भाव से गुरबाणी का श्रवण किया गया। उल्लेखनीय है कि ये वही रागी थे, जिन्होंने सन 1928 ईस्वी में क्रमशः 12, 10 और 8 वर्ष की आयु में गुरमत संगीत विद्यालय, तरनतारन साहिब (अमृतसर) से साढ़े तीन वर्षों का गुरमत संगीत प्रशिक्षण निज़ाम हैदराबाद की सरकार की छात्रवृत्ति पर प्राप्त किया था।

दक्खिनी सिख पंजाब से जो भी धार्मिक रीति – रिवाज़ साथ लाए थे, उनका पालन उन्होंने नांदेड़, (अब सचखंड श्री हजूर साहिब जी) में आकर आरंभ किया। इसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश और श्री दशम ग्रंथ साहिब जी दोनों सम्मिलित थे। गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के पश्चात पंजाब में इस परंपरा का परित्याग हो गया, किंतु दक्षिण में यह आज भी जीवंत रूप में विद्यमान है। संपूर्ण विश्व में पुरातन रीति – रस्मों और गुरमत मर्यादाओं के कठोर पालन की यह परंपरा दक्खिनी सिखों की विशिष्ट पहचान है।

यह भी उल्लेखनीय है कि पंजाब में जिन अनेक आचारों का परित्याग हो चुका है, दक्खिनी सिख आज भी उन्हें कर्तव्य, निष्ठा और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। रहित मर्यादा के अनुसार वे अपने नामों के साथ गोत्र नहीं जोड़ते। अमृतधारी बनने वाले व्यक्ति की जाति के आधार पर, अमृत छकने से पूर्व वह न तो व्यक्तित्व और न ही परिवार की प्रतिष्ठा में कोई भेदभाव करते हैं। विवाह अथवा आनंद कारज का आधार केवल रहित और आचरण है, न कि जाति-पाँति या वंशावली।

जब सिख फ़ौज इस क्षेत्र में आई, तो वह श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी और श्री दशम ग्रंथ साहिब जी की बीड़ों को साथ लेकर आई थी। अभ्यास स्वरूप वे अपने सभी सैन्य अभियानों में इन बीड़ों को साथ रखते थे। दक्खिनी सिखों के गुरुद्वारों में दोनों ग्रंथ पूर्ण श्रद्धा और सम्मान के साथ विराजमान हैं। ये गुरसिख प्रत्येक संगत में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के समक्ष मस्तक टेकते हैं और हुक्म लेते हैं और उतना ही आदर – सत्कार श्री दशम ग्रंथ साहिब जी को भी देते है परंतु केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को ही गुरु मानकर शीश नवाते हैं। इस परंपरा की आलोचना करना वस्तुतः अज्ञानता ही कही जाएगी।

भाई काहन सिंह नाभा की नांदेड़ यात्रा

भाई काहन सिंह नाभा सिक्खी के एक अद्वितीय और अप्रतिम विद्वान थे। उनका महानकोश– पंजाबी भाषा में सिख धर्म का प्रथम विश्वकोश; आज भी अपनी विद्वत्ता, प्रमाणिकता और व्यापकता के कारण अनुपम माना जाता है। वे जर्मन विद्वान मैक्स आर्थर मैकॉलेफ़ के प्रमुख सलाहकार थे, जिन्होंने The Sikh Religion नामक ग्रंथ के छह खंडों के माध्यम से सिख धर्म को पाश्चात्य जगत के समक्ष प्रस्तुत किया।

ऐतिहासिक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि भाई साहिब सन 1884 ईस्वी में नांदेड़ की यात्रा पर गए थे। पुनः सन 1929 ईस्वी में, चीफ़ खालसा दीवान द्वारा उन्हें ब्रिटिश न्यायाधीश श्री ए. एच. क्यूमिंग की न्यायिक जाँच से पूर्व भारत सरकार की ओर से हैदराबाद सरकार के पास भेजा गया था।

नांदेड़, (अब अबचल नगर श्री हजूर साहिब जी) स्थित गुरुद्वारा माल टेकड़ी साहिब का विवाद कालांतर में दक्खिनी सिखों और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक स्वरूप लेने लगा था। इस चर्चित और संवेदनशील प्रकरण में अंततः निर्णय सिखों के पक्ष में आया। इस संदर्भ के अतिरिक्त, भाई साहिब काहन सिंह द्वारा दक्षिण में सिख समुदाय से हुई किसी विस्तृत वैचारिक या सामाजिक बातचीत का कोई अन्य उल्लेख उपलब्ध नहीं होता।

संभवतः वे स्वयं को इतिहासकार के रूप में प्रस्तुत नहीं करते थे और इस विषय पर उन्होंने लेखन भी नहीं किया; तथापि अन्य इतिहासकार अवश्य थे, जिन्होंने इस क्षेत्र के सिखों तथा गुरुद्वारे से जुड़े विवादों पर कार्य किया। इसके बावजूद लेखक ऐसी किसी रचना का पता नहीं लगा सका, जिसमें दक्खिनी सिखों का समग्र, क्रमबद्ध और सुसंगत विवरण उपलब्ध हो।

मिस्टर हैंकिन और उनकी अंतिम इच्छा

मिस्टर हैंकिन हैदराबाद राज्य में अनेक वर्षों तक पुलिस महानिदेशक (जेल) के पद पर कार्यरत रहे। हैदराबाद छोड़ने के लगभग नौ वर्ष पश्चात, गुरुद्वारा माल टेकड़ी साहिब से संबंधित प्रकरण में यूनाइटेड किंगडम के आयोग के समक्ष उनसे उनकी आधिकारिक हैसियत में बयान लिए गए, कारण वह सचखंड गुरुद्वारा साहिब (श्री तख़्त हज़ूर साहिब) के मामलों के मुख्य नियंत्रक रह चुके थे।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में, जब मिस्टर हैंकिन गंभीर रूप से अस्वस्थ थे और मृत्यु के निकट पहुँच चुके थे, उन्होंने संदेश भिजवाया कि तख़्त हज़ूर साहिब में उनसे जाने – अनजाने हुई भूलों की क्षमा के लिए अखंड पाठ साहिब जी का पाठ कराया जाए। कहा जाता है कि अखंड पाठ के भोग पर अरदास के उपरांत उन्होंने प्राण त्याग दिए। यह घटना गुरु साहिब के प्रति उनकी गहन श्रद्धा, अटूट विश्वास और आत्मिक प्रतिबद्धता का मार्मिक प्रमाण है।

मिस्टर हैंकिन सिखों का गहरा सम्मान करते थे और उन पर पूर्ण विश्वास रखते थे। पुलिस और जेल विभाग के प्रमुख के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, जमायत – ए – सिखाँ, सिख फ़ोर्स की एक अनियमित टुकड़ी को विभागीय आदेशों के अधीन रखा गया था। सन 1951 ईस्वी में हैदराबाद राज्य के भारतीय संघ में विलय के पश्चात इस फ़ोर्स को भंग कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप दक्खिनी सिखों तथा उनके परिवारों को जो इस फ़ोर्स के सदस्य थे, उन्होंने अपने अनेक सम्मान और विशेषाधिकार खो दिए।

सिख मूल्यों के सच्चे संरक्षक

इतिहास साक्षी है कि किसी भी कौम को गुलाम बनाने अथवा किसी धर्म को नष्ट करने के लिए सर्वप्रथम उसके साहित्य और बौद्धिक परंपरा पर आघात किया जाता है। सन 1193 ईस्वी में विदेशी आक्रांता बख़्तियार खिलजी ने पुस्तकालयों को आग के हवाले कर दिया और बिहार स्थित नालंदा विश्वविद्यालय को पूर्णतः नेस्तनाबूद कर दिया।

हज़ारों वर्ष पूर्व स्थापित इस महान विश्वविद्यालय में उस समय लगभग दस हज़ार विद्यार्थी अध्ययनरत थे और दो सौ आचार्य अध्यापन करवाते थे। वह अपने युग का विश्व का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय ज्ञान-केंद्र था। बौद्ध धर्म भारत में जन्मा, किंतु भारत से ही लगभग समाप्त कर दिया गया। सिख धर्म भी पंजाब में जन्मा, परंतु आज सिख संपूर्ण विश्व में एक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

दक्खिनी सिखों ने पंजाब से बाहर रहते हुए भी सिक्खी के मूल सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन किया है और सिख मर्यादा को उच्च आदर्श बनाए रखा है, किंतु इस तथ्य को अब तक वह व्यापक मान्यता नहीं मिल सकी, जिसका दक्खिनी सिख वास्तविक अधिकारी है।

दक्षिण में सिखों का इतिहास यहाँ समाप्त नहीं होता; वास्तव में यह इतिहास यहीं से आरंभ होता है। इस गौरवशाली परंपरा को उसकी समस्त गरिमा और वैभव के साथ पुनः विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता है। इस महान इतिहास से प्रेरणा लेकर सिख विद्यार्थी, शोधार्थी और इतिहासकार इस क्षेत्र में आगे सार्थक कार्य कर सकते हैं।

आभार-

यह आलेख विविध गुरमुखी स्रोतों तथा विद्वानों के प्रामाणिक लेखन पर आधारित है, जिनका हिंदी में अनुवाद, संयोजन और समग्र साहित्यिक रूपांतरण लेखक द्वारा किया गया है। विशेष रूप से सिख विद्वान, चिंतक एवं शोधकर्ता सरदार नानक सिंह जी निश्तर के मौलिक लेख- विशेषतः उनकी पंजाबी कृति भूले-बिसरे नानक पंथी, इस अध्ययन की वैचारिक आधारशिला रहे हैं। इसके अतिरिक्त सरदार हरपाल सिंह रंजन, अध्यक्ष: पुरातन गुरुद्वारा साहिब आशा सिंह बाग़ शहीदान सिंह अस्थान, सिख छावनी अट्टापुर, हैदराबाद, तथा सरदार सतबीर सिंह जी (वरिष्ठ सिख साहित्यकार, हैदराबाद निवासी) द्वारा उपलब्ध कराए गए ऐतिहासिक यह पुरातन श्वेत-श्याम (ब्लैक एंड व्हाइट) इस आलेख के साथ प्रकाशित चित्र केवल कुछ क्षणों को नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में बसे सिखों के आत्मसम्मान, पहचान और संघर्षपूर्ण जीवन की धड़कन को अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन चित्रों में भारत के स्वर्गीय राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी का दक्खिनी सिख समुदाय के बीच उपस्थित होना, उस गहरे भावनात्मक रिश्ते का प्रतीक है, जो सत्ता से नहीं, बल्कि सांझी पीड़ा, साझा इतिहास और गुरु-परंपरा से जन्म लेता है। यह दृश्य अपने आप में इस सत्य को उद्घाटित करता है कि सिख पहचान किसी भौगोलिक सीमा की मोहताज नहीं रही, बल्कि वह देश के कोने-कोने में समान श्रद्धा और गरिमा के साथ जीवित रही है।

इन चित्रों में उस समय के प्रतिष्ठित सिख पंथ-रत्न, स्वर्गीय शहीद भाई जोगा सिंह जी की उपस्थिति विशेष रूप से भाव-विभोर कर देने वाली है। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि दक्षिणी सिख समाज की चेतना, संगठन और आत्मबल का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके चेहरे पर झलकता आत्मविश्वास और संगत के बीच उनकी स्वीकृति, यह बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी गुरु का सिख अपने अस्तित्व को कैसे सहेजता है।

ये चित्र समय की धूल में दबे हुए उन अनकहे अध्यायों को सामने लाते हैं, जहाँ दक्खिनी सिखों ने सीमित संसाधनों, सामाजिक उपेक्षा और विस्मृति के बीच भी गुरु की मर्यादा, सेवा-भाव और पंथीय अस्मिता को जीवित रखा। आज जब हम इन चित्रों को देखते हैं, तो यह केवल अतीत का दर्शन नहीं, बल्कि एक मौन पुकार है कि- इन चेहरों, इन स्मृतियों और इस विरासत को भुलाया न जाए अपितु आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखा जाए।

चित्रों, तथ्यों और मार्गदर्शन के लिए लेखक हृदय से उन सभी विद्वानों के अमूल्य योगदान के लिए आभार व्यक्त करता है। जिनके अमूल्य योगदान से ही इस आलेख को प्रमाणिकता, संतुलन और साहित्यिक गरिमा प्राप्त हुई है।

-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’

 

 

 


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