ੴ सतिगुर प्रसादि॥
चलते-चलते. . . .
(टीम खोज-विचार की पहेल)
जीवन के रंग-गुरुवाणी के संग
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
चलते–चलते. . . .
(टीम खोज–विचार की पहेल)
विश्व में सिख धर्म को सबसे आधुनिक धर्म माना गया है। सिख धर्म एक मार्शल धर्म भी है। ऐसी क्या विशेषता है इस धर्म की? जो सिख धर्म के अनुयायी हैं, उनकी एक विशेष प्रकार की ‘जीवन शैली’ होती है। इनके जीवन में विनम्रता और व्यक्तिगत स्वाभिमान और ‘गुरुवाणी’ का विशेष महत्व है। प्रत्येक सिख ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ के द्वारा ‘किरत करो, नाम जपो और वंड़ छकों’ के सिद्धांत के अनुसार जीवन व्यतीत करता है अर्थात कष्ट करो, प्रभु–परमेश्वर का स्मरण करो और जो भी प्राप्त हो उसे बांट कर खाओ। सिख धर्म की बुनियाद अंधविश्वास को ना मानने में है। अज्ञानता को दूर करने के लिए मानवीय जीवन में गुरु वाणी की शिक्षाओं से दिव्य ज्ञान को प्राप्त कर गुरुवाणी की शिक्षाओं के अनुरूप सिख ‘जीवन शैली’ चलती है। यदि प्रत्येक गुर सिख अपने जीवन में, इस लेख में संकलित 50 गुरुवाणी की निम्नलिखित सबद (पद्य) को कंठस्थ कर, अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या को मधुर, आनंदित और उत्साह की ऊर्जा से संचालित करने के लिये, अपने जीवन के क्रियाकलापों को करते समय गुरुवाणी के इन पदों का शुद्ध पठन करें तो निश्चित ही इस लोक के साथ–साथ परलोक भी सफल होगा एवं भविष्य का जीवन, जलप्रपात के झरने के द्वारा उत्पन्न कल–कल की ध्वनि की तरह अविरल, अविरत, अविराम, अलौकिक, आनंद की अनुभूति देने वाला होगा|
1.सुबह उठते समय—
बैठत ऊठत सोवत जागत विसरु नाही तूं सास गिरासा ||1|| रहाउ||
(अंग क्रमांक 378)
अर्थात् बैठते–उठते, सोते–खाते, श्वास लेते अथवा खाते समय, है अकाल पुरख, परमेश्वर तुम मुझे कभी भी विस्मृत ना हो|
2.स्नान के समय—
उदमु करे भलके परभाती इसनानु करे अंम्रित सरि नावै||
(अंग क्रमांक 305)
अर्थात् वह प्रतिदिन सुबह उठकर उद्यम करता है, स्नान करता है और फिर नाम–रूपी अमृत के सरोवर में डुबकी लगाता है।
3.तैयार होने के समय—
सेई सुंदर सोहणे || साधसंगि जिन बैहणे|
(अंग क्रमांक 132)
अर्थात् वहीं व्यक्ति सुन्दर एवं शोभनीय हैं, जो सत्संग में वास करते हैं।
4. ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को नमन करते समय—
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु|| (अंग क्रमांक 50)
अर्थात् गुरु की शरण में आकर शुभ आचरण एवं रहन–सहन की शिक्षा ग्रहण करों | इसके पश्चात तुम्हे कदाचित दुखी नहीं होना पड़ेगा|
5.भोजन के समय—
ददा दाता एकु है सभ कउ देवनहार||
(अंग क्रमांक 257)
अर्थात् एक अकाल पुरख–परमात्मा ही वह दाता है, जो समस्त जीवहं को भोजन–पदार्थ देने वाला है।
6.पानी पीते समय—
जिउ प्राणी जल बिनु है मरता तिउ सिखु गुर बिनु मरि जाई||
(अंग क्रमांक 757)
अर्थात् जैसे प्राणी जल के बिना मर जाता है, वैसे ही गुरु के बिना शिष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाता है|
7.घर से बाहर जाते समय—
घरि बाहरि प्रभु सभनी थाई|| संगि सहाई जह हउ जाई||
(अंग क्रमांक 1340)
अर्थात् घर बाहर हर स्थान पर प्रभु ही विद्यमान है, जहाँ भी हम जाते हैं, परमपिता परमात्मा हमें साथ देकर सहायता करता है|
8.पढ़ाई करते समय—
विदिआ विचारी ताँ परउपकरी|| (अंग क्रमांक 356)
अर्थात् यदि विद्या का विचार–मनन किया जाए तो ही परोपकारी बना जा सकता है।
9.किसी अजनबी की मदद करते समय—
ना को बैरी नही बिगाना सगल संगि हम कउ बनि आई||
(अंग क्रमांक 1299)
अर्थात् न कोई शत्रु है, न ही कोई पराया है, मेरा सब के साथ प्रेम बना हुआ है|
10.अनावश्यक भोजन खाते समय—
फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु॥
(अंग क्रमांक 790)
अर्थात् उस व्यक्ति का जीना धिक्कार योग्य है, जिसनें स्वादिष्ट पदार्थ खा–खाकर अपना पेट बड़ा लिया है।
11.मल्टीमीडिया देखते समय—
अखी देखि न रजीआ बहु रंग तमासे।
(वारां भाई गुरदास जी 27 पउड़ी 9)
अर्थात् दुनिया का तमाशा देख कर आंखे कभी भरती नही है|
12.प्राकृतिक नजारों को देखते हुए—
बलिहारी क़ुदरति वसिआ ||
तेरा अंतु न जाई लखिआ ॥1॥ रहाउ ॥
(अंग क्रमांक 469)
अर्थात् हे जगत रचयिता अकाल पुरख ! मैं तुझ पर बलिहार जाता हूँ, तू अपनी क़ुदरत में निवास कर रहा है|
13. अन्य धर्मों के लोगों से मिलते समय—
हिंदू तुरक कोऊ राफिज़ी इमाम साफी मानस की जाति सबै एकै पहिचानबो||
(क्रमांक 47 अकाल उसत्त)
अर्थात् कोई हिन्दू है और कोई मुसलमान है, कोई सिया है और कोई सुन्नी है परंतु प्रजाति के रूप में सभी इंसानों को एक ही माना जाता है|
14.गुरु सिखों की मुलाकात के समय—
आगे आवत सिंह जु पावै||
वाहिगुरु जी की फतिह बुलावै||
अर्थातं जब एक गुरु का सिख, दूसरे गुरु के सिख को मिलता है तो वह उर्जित होकर गुरु फतेह की सांझ करता है|
15.निंदा सुनते समय—
करन न सुनै काहू की निंदा ||
सभ ते जानै आपस कउ मंदा॥
(अंग क्रमांक 274)
अर्थात् जो अपने कानों से किसी की निंदा सुनता, वह अपने आपको बुरा (निम्न) समझता है|
16.जन्मोत्सव मनाते समय—
पूता माता की आसीस॥
निमख न बिसरउ तुम् कउ हरि हरि सदा भजहु जगदीस||1|| रहाउ||
(अंग क्रमांक 496)
अर्थात् हे पुत्र! तुम्हें यह माता की आशीष है कि एक क्षण भर के लिए भी तुझे भगवान विस्मृत न हो तथा तुम सदैव ही जगदीश का भजन करते रहो।॥ 1 ॥ रहाउ ॥
17.महिलाओं को समानता का हक देते समय—
सो किउ मंदा आखीऐ जितु जंमहि राजान||
(अंग क्रमांक 473)
अर्थात् वह नारी कैसे बुरा हो सकती है? जिसने बड़े–बड़े राजा, महाराजाओं एवं महापुरुषों को जन्म दिया है।
18.पराई स्त्री को देखते समय—
देखि पराईआ चंगीआ मावाँ भैणाँ धीआँ जाणै||
(वारां भाई गुरदास जी क्रमांक 29 पउड़ी)
अर्थात् सिखों को पराई स्त्री को अपनी मां, बहन और बेटी के समान समझना चाहिये|
19. दुख: के समय में—
केतिआ दूख भूख सद मार॥
एहि भि दाति तेरी दातार॥
(अंग क्रमांक 5)
अर्थात् कईयों को दुख व भूख की मार सदैव पड़ती रहती है, क्योंकि यह उनके कर्मों में ही लिखा होता है। किन्तु सज्जन लोग ऐसी मार को उस परमात्मा की बख्शिश ही मानते हैं। (इन्हीं कष्टों के कारण ही मानव जीव को वाहिगुरु का स्मरण होता है)।
20. किसी भी कार्य को प्रारंभ करते समय—
कीता लोड़ीऐ कंमु सु हरि पहि आखीऐ॥
कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ॥
(अंग क्रमांक 91)
अर्थात् यदि कोई नवीन कार्य प्रारंभ करना हो तो उसकी सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। सतिगुरु जी की प्राप्त शिक्षा के अनुसार सच्चा प्रभु अपने सेवक का कार्य आप संवार देता है।
21. नये कपड़े ख़रीदते समय—
बाबा होरु पैनणु खुसी खुआरु||
जितु पैधै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार|| 1 || रहाउ ||
(अंग क्रमांक 16)
अर्थात् हे परम पिता परमेश्वर जी! मन की भावना के अनुसार कपड़े पहनने से प्राप्त सुख झूठे होते है। जिन वस्त्रों को पहनने से तन को पीड़ा हो तथा मन में विकारों की उत्पत्ति हो, ऐसे वस्त्र पहनने व्यर्थ हैं ॥1॥ रहाउ ॥
22.शरीर की देखभाल के समय—
नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देही कउ पालि॥
(अंग क्रमांक 554)
अर्थात् हे नानक! उस प्रभु को ही याद करना चाहिए, जो इस मानव देहि का पालन पोषण करता है॥
23.नाम जपते समय—
वाहिगुरु गुरमंत्र है जपि हउमै खोई||
(वारां भाई गुरदास जी क्रमांक 13 पउड़ी 2) अर्थात् वाहिगुरु का नाम गुरु मंत्र है और जिसे जपने से अहंकार दूर होता है|
24.प्रशंसा और निंदा को सुनते समय—
उसतति निंदा दोऊ तिआगै खोजै पदु निरबाना॥
(अंग क्रमांक 219)
अर्थात् मनुष्य को किसी की प्रशंसा एवं निंदा करना दोनों ही त्यागने योग्य हैं और उसके लिए मुक्ति के मार्ग को खोजना न्यायोचित है।
25.चिंता करते समय—
चिंता छडि अचिंतु रहु नानक लगि पाई|
(अंग क्रमांक 517)
अर्थात् हे नानक प्रभु के चरण–स्पर्श कर तथा चिन्ता छोड़कर अचिंत रहै|
26.बुरे लोगों की संगत के समय—
कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ||
उह झूलै उह चीरीऐ साकत संगु न हेरि॥
(अंग क्रमांक 1364)
अर्थात् कबीर जी कहते हैं कि बुरी संगत ही मनुष्य को मारती है, जब केले के निकट बेरी होती है तो वह हवा से झूमती है, मगर केले का पेड़ उसके काँटों से कटता-फटता रहता है, अतः कुटिल लोगों की संगत मत करो, (अन्यथा बेकार में ही दण्ड भोगोगे)|
27.श्रृंगार करते समय—
भै कीआ देहि सलाईआ नैणी भाव का करि सीगारो||
ता सोहागणि जाणीऐ लागी जा सहु धरे पिआरो||
(अंग क्रमांक 722)
अर्थात् अपने नयनों पर प्रभु के डर रूपी सुरमे की सिलाइयों को डाल और प्रभु के प्रेम का श्रृंगार कर, यदि पति–प्रभु, जीव–स्त्री से प्रेम धारण करेगा तो ही वह सुहागिन जानी जायेगी|
28.दहेज देते व लेते समय—
होरि मनमुख दाजु जि रखि दिखालहि॥
सु कूड़ु अहंकारु कचु पाजो||
हरि प्रभ मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो||
(अंग क्रमांक 79)
अर्थात् हरिनाम के दहेज के अतिरिक्त जो लोग दान–दहेज का प्रदर्शन करते है,वह मिथ्या-आडम्बरी और अंहकारी होते है| हे मेरे बाबुल! मुझे दहेज में केवल हरि–नाम का ही दान व दहेज देना|
29 ना डरो, ना डराओ के सिद्धांत को अमल में लाते समय—
भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन||
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बख़ानि||
(अंग क्रमांक 1427)
अर्थात् ना किसी व्यक्ति को डराओ और ना ही किसी का डर मानना है|| नानक का कथन है कि हे मन ! सुन, उसी को ज्ञानी कहना चाहिए||
30. सभी से प्यार करते समय—
सभु को मीतु हम आपन कीना हम सभना के साजन||
(अंग क्रमांक 671)
अर्थात् मैंने सभी को अपना मित्र बना लिया है और मैं सबका साजन बन गया हूँ।
31. सुंदर घर में रहते समय—
जिह प्रसादि बसहि सुख मंदरि॥
तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि॥
(अंग क्रमांक 269)
अर्थात् जिसकी कृपा से तुम महलों में सुख से रहते हो, उस अकाल पुरख का स्मरण हमेशा मन में रखना है।
32.गुरुवाणी शिक्षण की सेवा करते समय—
जैसे सत मंदर कंचन के उसार दीने तैसा पुंन सिख कउ इक सबद सिखाए का||
(वारां भाई गुरुदास जी कबित 673)
अर्थात् जैसे सौ सोने के मंदिरों का निर्माण कर दान कर दिये तो जो पुण्य प्राप्त होता है उतना ही पुण्य किसी गुरु के सिख को गुरुवाणी के एक सबद् की शिक्षा देने पर प्राप्त होगा|
33.किसी से धोखा करते समय—
हरि बिसरत सदा खुआरी॥
ता कउ धोखा कहा बिआपै जा कउ ओट तुहारी ॥ रहाउ॥
(अंग क्रमांक 711)
अर्थात् परमेश्वर को विस्मृत करने से मनुष्य सदैव ही दुखी रहता है। हे परमेश्वर! जिसे तुम्हारी शरण मिली हुई है, फिर वह कैसे धोखे का शिकार हो सकता है|
34.सेवा करते समय—
सेवा करत होइ निहकामी॥
तिस कउ होत परापति सुआमी॥
(अंग क्रमांक 286)
अर्थात् जो सेवक निष्काम भावना से गुरु की सेवा करता है, वह प्रभु को पा लेता है।
35.दसवंद (किरत कमाई का दसवां हिस्सा) देते समय—
घालि खाइ किछु हथहु देइ॥
नानक राहु पछाणहि सेइ॥1॥
(अंग क्रमांक 1245)
अर्थात् जो मेहनत करके निर्वाह करता है, दूसरों की मदद अथवा दान करता है, हे नानक! ऐसा व्यक्ति ही सच्चे जीवन की राह को पहचानता है|
36.किसी बुरे का भी भला करते समय—
फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढाइ ||
देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ||
(अंग क्रमांक 1381)
अर्थात् बाबा फरीद उपदेश देते हुए कथन करते हैं कि हे प्राणी! अगर कोई तेरे साथ बुरा करे तो उसका भी भला ही कर और मन में गुस्सा मत आने दे। इससे शरीर को कोई रोग अथवा बीमारी नहीं लगती और सभी कुछ प्राप्त हो जाता है।
37. दोस्त बनाते समय—
गुरमुख सउ करि दोसती सतिगुर सउ लाइ चितु ॥
(अंग क्रमांक 1421)
अर्थात् गुरमुखों से दोस्ती कर और सच्चे गुरु से चित्त लगाना चाहिए|
38.शत्रु की सहायता के समय—
धनु धनु हरि गिआनी सतिगुरु हमारा जिनि वैरी मित्रु हम कउ सभ सम द्रिसटि दिखाई ॥
(अंग क्रमांक 594)
अर्थात् हरि का ज्ञानवान हमारा सतगुरु है, जिसने हमें समदृष्टि से सभी शत्रु एवं मित्र दिखा दिए हैं।
39.अत्याचारी को सबक सिखाते समय—
चु कार अज़ हमह हीलते दर गुज़शत ||
हलाल असतु बुरदन ब शमशेर दसत||
(1730 ज़फ़रनामा)
अर्थात् जब सारे प्रयास विफल हो जाते है तो न्याय के लिये कृपाण उठानी ही पड़ती है|
40.धर्म–कर्म करते समय—
सरब धरम महि स्रेसट धरमु॥
हरि को नामु जपि निरमल करमु॥
(अंग क्रमांक 265)
अर्थात् समस्त धर्मों में सर्वोपरि धर्म है ईश्वर के नाम का जाप करना एवं पवित्र कर्मों को करना।
41.धर्म के लिए अपने प्राणों की आहुति देते समय—
सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत॥
पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेतु॥
(अंग क्रमांक 1105)
अर्थात् सच्चा शूरवीर वही समझा जाता है जो अपने धर्म एवं मासूमों के लिए लड़ता है। धर्म एवं गरीबों की खातिर चाहे वह अंग–अंग से कट कर मर जाए किन्तु वह रणभूमि को कदापि नहीं छोड़ता है|
42.शराबी को सलाह देते समय—
जितु पीतै मति दूरि होइ बरलु पवै विचि आइ॥
आपणा पराइआ न पछाणई ख़समहु धके खाइ॥
(अंग क्रमांक 554)
अर्थात् जिसका पान करने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और उन्माद दिमाग में आ जाता है, जिससे मनुष्य अपने व पराए की पहचान नहीं कर पाता और अपने मालिक प्रभु की और से धक्के खाता है।
43.जब अश्लील गीत सुनाई पड़े—
मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए||
साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए|| रहाउ ||
(अंग क्रमांक 820)
अर्थात् हे मेरे मोहन! वे मेरे कानों में मुझे कभी न सुनाई पड़े, जो मायावी जीव अभद्र गीतों के स्वर एवं ध्वनियाँ गाते हैं और व्यर्थ बोल बोलते है|
44.भाणा (उसकी रजा) मानते समय—
तेरा कीआ मीठा लागै॥
हरि नामु पदारथु नानकु माँगै॥
(अंग क्रमांक 394)
अर्थात् है भगवान्! तेरा किया हुआ प्रत्येक कार्य मुझे मीठा लगता है। नानक! तुझ से हरिनाम रूपी पदार्थ ही माँगता है॥
45.अच्छे और बुरे दिनों पर विचार करते समय—
सतिगुर बाझहु अंधु गुबारु॥
थिती वार सेवहि मुगध गवार॥
(अंग क्रमांक 843)
अर्थात् सतगुरु के बिना जगत् में घोर अन्धेरा बना रहता है। मूर्ख गंवार व्यक्ति ही तिथियों एवं वारों को मानते हैं।
46.श्राद्ध करते समय—
जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही||
पितर भी बपुरे कहु किउ पावहि कऊआ कूकर खाही॥
(अंग क्रमांक 332)
अर्थात् मनुष्य अपने पूर्वजों (माता पिता) की उनके जीवित रहने तक तो सेवा नहीं करते परन्तु (उनके) मरणोपरांत पितरों का श्राद्ध करवाते हैं, बताओ, बेचारे पितर भला श्राद्धों का भोजन कैसे पाएँगे? इसे तो कौएं–कुत्ते खा जाते हैं।
47. माता–पिता से लड़ते समय—
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप|
जिन के जणे बड़ीरे तुम हउ तिन सिउ झगरत पाप॥1॥रहाउ॥
(अंग क्रमांक 1200)
अर्थात् हे पुत्र! अपने पिता से क्यों झगड़ा कर रहे हो? जिन्होंने जन्म देकर तुम्हें बड़ा किया है, उनके साथ झगड़ा करना पाप है|
48.गुरुवाणी के अनुसार जीवन जीकर, मरने वाला व्यक्ति—
गुरमुखि जनमु सवारि दरगह चलिआ।
सची दरगह जाइ सचा पिड़ मलिआ
(भाई गुरदास जी 19, पउड़ी 14)
अर्थात् गुरुमुख व्यक्ती अपने जन्म को सवार के (सफल कर के) परलोक गमन करते है और उन्हे सचखंड में मुक्ती प्राप्त होती है|
49.अकाल पुरख की स्तुति करते समय—
प्रभ की उसतति करहु संत मीत॥
सावधान एकागर चीत॥
(अंग क्रमांक 295)
अर्थात् हे संत मित्रों! प्रभु की महिमा–स्तुति सावधान एवं एकाग्र चित्त होकर करो।
50,संगत करते समय—
वडभागी हरि संगति पावहि॥
भागहीन भ्रमि चोटा खावहि॥
(अंग क्रमांक 95)
अर्थात् भाग्यशाली व्यक्ती हरि की संगत प्राप्त करता है परंतु भाग्यहीन मनुष्य भ्रम में भटकते और चोट सहते हैं।
इस जीवन शैली में गुरुवाणी की उक्त 50 पदों को कंठस्थ कर, अपनी जीवन यात्रा में चलते–चलते–चलते रहोगे तो निश्चित ही इस पृथ्वीलोक पर भी ‘सचखंड’ का आनंद प्राप्त होगा|
नोट—1. ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।
2. गुरुवाणी का हिंदी अनुवाद गुरुवाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।
साभार– लेख में प्रकाशित गुरुवाणी के पद्यो की जानकारी और विश्लेषण सरदार गुरदयाल सिंह जी (खोज–विचार टीम के प्रमुख सेवादार) के द्वारा प्राप्त की गई है।
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