खूबसुरत सच
एक अत्यंत बुजुर्ग शिक्षिका भीषण गर्मियों के दिन में भीड़–भरी बस में जैसे–तैसे चढ़ गई, अपनी उम्र के इस दौर में वह पहले से ही अपने घुटनों के दर्द से पीड़ित थी। बस की भीड़ को देख कर उसके चेहरे पर दर्द भरी टीस उभर आई थी कारण उसे इस बस से लंबी दूरी तक की यात्रा करनी थी और बस में बैठने के लिए कोई सीट उपलब्ध नहीं थी। इतने में बस की सीट पर बैठी एक अन्य सामान्य से हाव–भाव वाली गृहस्थ महिला ने उस बुजुर्ग शिक्षिका को अपने निकट बुला कर स्वयं खड़े होकर उस शिक्षिका को अपनी सीट पर स्थानापन्न कर दिया। उस बुजुर्ग शिक्षिका ने हृदय से उसका आभार माना और उस बुजुर्ग शिक्षिका को घुटने के दर्द से कुछ राहत महसूस होने लगी थी।
कुछ समय के पश्चात बुजुर्ग शिक्षका के पास वाली सीट खाली हो गई थी परंतु उस साधारण हाव–भाव वाली महिला ने स्वयं न बैठते हुए एक दूसरी महिला जिसके हाथों में एक छोटा बच्चा था, को उस स्थान पर बैठा दिया था। अगले बस स्टॉप पर बच्चे के साथ सीट पर बैठी महिला भी उतर गई थी और सीट खाली हो चुकी थी परंतु उस नेकदिल साधारण सी महिला ने दरियादिली दिखा कर अपने हक की सीट पर एक वृद्ध और कमजोर व्यक्ति को बैठा दिया था, जो अभी–अभी ही बस पर सवार हुआ था।
बस अपने गंतव्य स्थान की और तेजी से बढ़ रही थी और उस बस का आखिरी स्टाफ भी समीप ही था और बस की सवारियां बहुत हद तक उतर चुकी थी, बस की लगभग सीटें खाली हो चुकी थी। सीट पर बैठी बुजुर्ग शिक्षिका ने उस साधारण से हाव–भाव वाली महिला को अपने निकट बैठा लिया और कहा कि चलती हुई बस में कितनी बार सीटें खाली हुई परंतु तुम स्वयं ना बैठ कर अन्य जरूरतमंद लोगों को बैठाती रही, क्या बात है? उस साधारण हाव–भाव वाली महिला ने बुजुर्ग शिक्षिका से कहा कि मैं एक गरीब–मजदूर औरत हूं और बड़ी मुश्किल से अपना एवं अपने परिवार का भरण–पोषण करती हूं, मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं दान–पुण्य कर किसी की कुछ मदद कर सकें। इसलिए मैं शारीरिक श्रम कर लोगों की मदद करने का प्रयास करती हूं, जैसे की रास्ते में पड़े हुए गड्ढों में मिट्टी डाल कर रास्ते ठीक करने का प्रयास करती हूं ताकि रास्ते में होने वाली दुर्घटनाओं से बचा जा सके या किसी जरूरतमंद राहगीर को ठंडा पानी पिला देती हूं, या बस में अपनी सीट लोगों को बैठने के लिए दे देती हूं, जिससे सामने वाला व्यक्ति मुझे दुआएं देता है और में अपनी गरीबी का दुख भूल जाती हूं। जब मैं दोपहर में भोजन करने के लिए बैठती हूं, तो पक्षीयों को अपने भोजन में से कुछ हिस्सा खिला देती हूं और जब वह पक्षी खुशी से कोलाहल करते है तो उन्हें देखकर मेरा पेट तृप्त हो जाता है। ठीक है! मेरे पास धन न सही परंतु मेरे इस छोटे से त्याग से जो लोग मुझे मुफ्त में दुवाये देते है, मेरे लिये वो ही बहुत है और इस दुनिया से हमने लेकर भी क्या जाना है? बुजुर्ग शिक्षिका इस साधारण हाव -भाव वाली अशिक्षित महिला के जवाब से दंग रह गई थी कारण एक अनपढ़ दिखने वाली महिला ने उस बुजुर्ग शिक्षिका को जीवन का बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया था।
अगर दुनिया के आधे लोग ऐसी सकारात्मक सोच को अपना लें तो निश्चित ही धरती स्वर्ग बन जाएगी परंतु सच तो यह है कि सच बहुत सरल जैसा है, एक साधारण सी इच्छा की तरह! कोई श्रृंगार नहीं! कोई तामझाम नहीं! कोई बनावटीपन नहीं! परंतु इस सच की खूबी यह है कि यह बेहद खूबसूरत सच है।
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