कायनात के गुरु: गुरु श्री ग्रंथ साहिब जी

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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

चलते–चलते. . . .

(टीम खोज–विचार की पहेल)

कायनात के गुरु: श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी

संपूर्ण कायनात के गुरु, ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की संपादना की महान सेवा सिख धर्म के संस्थापक प्रथम गुरु, ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ से ही प्रारंभ हो चुकी थी। ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ ने समकालीन सभी भक्तों, संतों और विद्वानों की वाणी का संकलन प्रारंभ किया। प्रमुख रूप से इन वाणीयों में एक अकाल पुरख (प्रभु–परमेश्वर) की महिमा का वर्णन किया गया है। इस संपूर्ण बहुमूल्य खजाने की विरासत आपने दूसरे गुरु ‘श्री गुरु अंगद देव साहिब जी’ को सौंपी थी। ‘श्री गुरु अंगद देव साहिब जी’ ने इन वाणीयों की छोटी–छोटी (गुटका साहिब जी) पुस्तकों के रूप में प्रचार–प्रसार किया। इसके पश्चात ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की वाणी और ‘श्री गुरु अंगद देव साहिब जी’ द्वारा रचित वाणीयों का संकलन तीसरे गुरु ‘श्री गुरु अमरदास साहिब जी’ को विरासत के रूप में मिला। इस तरह से इन वाणीयों का संकलन चौथे गुरु ‘श्री गुरु रामदास साहिब जी’ के कार्यकाल से होते हुए पांचवें गुरु ‘श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी’ को विरासत में मिला। इन सभी वाणीयों की प्रमाणिकता ठीक रहे और उनमें कोई मिलावट ना हो इसलिए पांचवे गुरु ‘श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी’ ने भाई ‘गुरदास जी’ की सहायता लेकर इन सारी वाणीयों को क्रमानुसार संकलित कर ‘श्री आदि ग्रंथ साहिब जी’ की स्थापना की थी। इस स्थापना दिवस को ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के प्रथम प्रकाश पर्व के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है और इसी दिन ‘श्री हरमंदिर साहिब जी’ अमृतसर में ‘श्री आदि ग्रंथ साहिब जी’ को सुशोभित किया गया था। ‘श्री आदि ग्रंथ साहिब जी’ की वाणीयों का प्रचार–प्रसार कर समाज में अज्ञानता को दूर कर, ज्ञान का प्रकाश इन वाणीयों से किया जाता था।

‘श्री आदि ग्रंथ’ में सिख धर्म के प्रथम 5 गुरुओं की वाणी अंकित है और समकालीन 15 भक्तों की वाणीओं का संकलन किया गया है। जिन 15 भक्तों की वाणीयों का भी संकलन किया गया है। वह सभी भक्त स्वयं मेहनत–मजदूरी कर, किरत करते थे एवं परमात्मा के सच्चे नाम का प्रचार–प्रसार करते थे।

सिख धर्म के नौवें गुरु ‘धर्म की चादर, ‘श्री गुरु तेग बहादुर जी’ की वाणी को स्वयं आप दशमेश पिता ‘श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी’ ने ‘श्री आदि ग्रंथ’ में अंकित की थी। ‘श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी’ ने ‘श्री आदि ग्रंथ’ को गुरु ‘श्री ग्रंथ साहिब जी’ संबोधित कर महाराष्ट्र की पवित्र धरती ‘श्री अबचल नगर हजूर साहिब’ नांदेड़ में युगो–युग अटल ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की जागती–ज्योत, जोहरा–जहूर, हाजरा–हजूर की उपाधि से सुशोभित कर गुरु स्थान का सम्मान दिया था।

‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के संपादन में वाणीयों को इस तरह से अनुक्रमित किया गया है। जिससे इसमें किसी भी प्रकार की मिलावट की कोई संभावना नहीं रहती है। हर एक वाणी को इस तरह से अंकित किया गया है कि उसके क्रमांक से जिन गुरुओं की या भक्तों की वाणी है का तुरंत पता चल जाता है। इसी तरह से गुरमत संगीत के जिन रागों में वाणी को अंकित किया गया है उनका भी नाम से दर्शाया गया है। साथ ही उन रागों के कौन से घर/ताल (PITCH) में सबद (पद्य) का उच्चारण करना है, उसे भी वर्णित किया गया है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ में हर एक पढ़ी जाने वाली वाणी की विशेषता को भी पढ़ने के पहले अंकित किया गया है।

‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ में प्रभु–परमेश्वर (अकाल पूरख) के कई पर्यायवाची नाम अंकित है, जैसे राम, हरि, अल्लाह, अकाल पुरख, किशन, मुरारी, रहीम इत्यादि। इस प्रकार ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ ज्ञान का अथाह समुद्र है। अखंड भारत के सभी अलग–अलग प्रांतों के भक्तों की वाणीयों को और सभी धर्मों के उपदेशों के सार को ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ में संकलित किया गया है। इसीलिए चंवर, तख़्त के मालिक ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को संपूर्ण कायनात का गुरु माना जाता है। इसमें अंकित वाणी इंसानियत की वाणी है। कायनात में स्थित हर प्राणी के कल्याण के लिए ही ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की स्थापना हुई है।

‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की इन्हीं विशेषताओं के कारण हर धर्म, मजहब और पंथ के व्यक्ति बहुत ही आदर–सत्कार के साथ, विनम्रता पूर्वक अपना शीश झुकाकर ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को प्रणाम करते हैं और प्यार के साथ क़ीमती वस्तुओं को ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को भेंट स्वरूप अर्पित करते हैं। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ सांझी वालता (सर्वधर्म समभाव) के सबसे बड़े प्रतीक है। इसका श्रेष्ठ उदाहरण है, सऊदी अरब के एक हमारे मुस्लिम धर्मीय भाई ‘हाजी मोहम्मद मस्कीन’!

हाजी मोहम्मद मस्कीन जी की श्रद्धा हम सभी के लिए एक आदर्श है। आप जी ने ‘नौ मन चौदह सेर’ अर्थात 350 किलो क़ीमती लाल चंदन की लकड़ी के तने को लेकर अल्लाह ताला और ख़ुदा के नाम को स्मरण कर एक–एक बारीक रेशे को उस तने से अपने तकनीकी ज्ञान को लगाकर अलग किया। अलग किए गए रेशों को स्वच्छ कर तैयार किया गया। इस पूरे कार्य को अंजाम देने के लिए 5 वर्ष 7 महीने का समय लगा और जब इन बहुमूल्य रेशों की गिनती की गई तो वह 1045000 (एक लाख पैंतालीस हजार) थे। इन सभी रेशों को एकत्रित कर एक बेशक़ीमती अमूल्य चंवर (गुरुमुखी में जिसे चौर साहिब कहकर संबोधित किया जाता है) को तैयार किया।

‘हाजी मोहम्मद मस्कीन’ ने ऐलान किया कि इस ‘चंवर साहिब’ को उस राजा के शीश पर लहराया जाएगा, जो सभी को एक जैसा प्यार बांटता हो। सभी धर्मों को बराबरी का दर्जा देकर सम्मान करता हो। पूरी दुनिया में खोज करने पर ऐसा कोई राजा नहीं मिला। जब गहराई से अध्ययन किया तो ज्ञात हुआ की केवल ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ ही ऐसे हैं, जो राजाओं के भी राजा है। ‘हाजी मोहम्मद मस्कीन’ ने निर्णय कर उस बेशक़ीमती अमूल्य चंवर (चौर साहिब)को लेकर ‘श्री दरबार साहिब जी, अमृतसर में उपस्थित हुये। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के समक्ष इन्होंने सजदा कर कीर्तन श्रवण किया, 31 दिसंबर 1925 ई. के दिन उन्होंने उस समय के रागी सिंहों से मिलकर अपने आने का उद्देश्य बताया और इनके द्वारा निर्मित बहुमूल्य, बेशक़ीमती चंवर को ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को भेंट स्वरूप अर्पित किया। यह अमूल्य ‘चंवर साहिब’ आज भी ‘श्री हरमंदिर साहिब जी दरबार साहिब’ में सुशोभित है। दरबार साहिब के तोशे ख़ाने में इसे सुशोभित कर के रखा गया है। इस ‘चंवर साहिब’ के प्रत्येक वर्ष संगत को दर्शन कराए जाते हैं।

इससे पता चलता है कि ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की महानता और सांझी वालता को दुनिया ने स्वीकार किया है।

मानवता और इंसानियत के महान गुरु ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ और उनकी सेवा में अमूल्य चंवर साहिब समर्पित करने वाले ‘हाजी मोहम्मद मस्कीन’ जी को सादर नमन!

नोट—1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।

2. उपरोक्त लेख ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के प्रथम प्रकाश पर्व को समर्पित है।

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प्रकाश पर्व विशेष: बाबा श्री चंद जी

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