‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ ने अपने जीवन काल में चार युद्ध किए थे। प्रथम युद्ध को इतिहास में ‘अमृतसर’ के युद्ध से जाना जाता है। इस युद्ध के पूर्व बीबी बीरों के ‘परिणय बंधन’ को आयोजित किया गया था। इस परिणय बंधन के अवसर पर ही युद्ध प्रारंभ हो गया था। उस समय भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ की आयु केवल 7 वर्ष की थी। इस छोटी आयु में ही आप इन युद्धों के प्रत्यक्षदर्शी थे। दूसरा युद्ध ‘हरगोविंद पुरा’ का एवं तीसरा युद्ध ‘महिराज’ के युद्ध के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है इन तीनों युद्धों के भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ प्रत्यक्षदर्शी थे।
इस तीसरे युद्ध के पश्चात भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ का करतारपुर में परिणय बंधन संपन्न हुआ था। इस संपन्न परिणय बंधन के पश्चात ही पैंदे खान से करतारपुर का चौथा युद्ध हुआ था। पैंदे खान वह अनाथ बालक था जिसे ‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ ने आश्रय देकर उसका पालन-पोषण किया था। इस बालक पैंदे खान के पालन-पोषण के लिए दो भैंस के दूध का भी प्रबंध किया गया था। गुरु जी स्वयं पैंदे खान के पालक की भूमिका निभा रहे थे एवं जीवन में आवश्यक सभी सुविधाएं मुहैया करवाई थी। इस पैंदे खान का निकाह भी गुरु जी की कृपा दृष्टि से हुआ था। गुरु जी ने इस पैंदे खान की बेटी का निकाह भी करवाया था और इनके निवास के लिए भवन निर्माण भी करवाया था परंतु ‘नमक हराम’ पैंदे खान अपने जमाई काले खान के बहकावे में आकर स्वयं के साथियों के साथ और मुगल सरकार की सेनाओं से मिलकर करतारपुर पर आक्रमण कर दिया था।
इस करतारपुर के युद्ध के इतिहास को अन्य संदर्भ ग्रंथों और सोशल मीडिया से भी जाना जा सकता है परंतु हम इस श्रृंखला में केवल भावी ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ के इतिहास को ही वर्णित कर रहे हैं।
पेंदे खान और काले खान ने गुरु घर के विरोधी मुगल सरकारों के साथ मिलकर पूरी ताकत से करतारपुर पर आक्रमण कर दिया था। अहंकारी पैंदे खान स्वयं को बहुत बड़ा सूरमा,शूरवीर और योद्धा समझता था। उसे यह गुमान था कि पहले के युद्ध केवल उसके शौर्य से ही जीते गए थे। इस अंहकारी का पहले भी गुरु जी ने एक बार अंहकार तोड़ा था परंतु अपनी ताकत, मक्कारी और मुगल सरकार की सेनाओं के साथ मिलकर उसने करतारपुर पर आक्रमण कर दिया था।
दूसरी और सिख योद्धाओं ने भी इस युद्ध को गंभीरता से लेते हुए अपनी संपूर्ण तैयारी की थी। जब यह युद्ध प्रारंभ हुआ था तो उस समय भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ ने अपनी आयु के 14 वें वर्ष में प्रवेश किया था। इस आयु में आप जी ने शस्त्र विद्या, घुड़सवारी और ‘तेग’ नामक शस्त्र को चलाने में महारत हासिल कर ली थी। भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर जी’ अपने नाम के विशेषण अनुसार ‘तेग के धनी’ अर्थात ‘तेग बहादुर’ के रूप में प्रस्थापित हो चुके थे।
इस करतारपुर के युद्ध में अपनी ‘तेग’ के जौहर दिखाने के लिए आप जी ‘माता नानकी जी’ का आशीर्वाद लेकर विदा हुए थे और उस समय ‘माता गुजरी जी’ ने उन्हें स्वयं अपने हाथों से तेग नामक शस्त्र एवं अन्य शस्त्रों से सुशोभित किया था।
जब भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ इस युद्ध के लिए घोड़े पर सवार होकर ‘शीश महल’ से प्रस्थान कर रहे थे तो (वर्तमान में इस स्थान पर आज गुरुद्वारा थंम साहिब का विशाल भवन स्थित है। इस भवन के पीछे ही ‘शीश महल’ के अवशेष ऐतिहासिक धरोहर के रूप में शेष है) इस ‘शीश महल’ की छत से ही ‘माता नानकी जी’ ने और माता ‘गुजर कौर जी ने भावी ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ के ‘युद्ध कौशल्य’ को स्वयं अपनी आंखों से निहारा था।

‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ स्वयं पेंदा खान और काले खान से युद्ध कर रहे थे। इस भीषण युद्ध में भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ ने जब अपने ‘तेग’ नामक शस्त्र के जौहर दिखाने प्रारंभ किए तो दुश्मनों ने आश्चर्यचकित होकर अपने मुंह में उंगलियों को दबा लिया था। इस युद्ध में अभूतपूर्व ‘युद्ध कौशल्य’ का परिचय देते हुए इस छोटी आयु के भावी ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ ने सिद्ध कर दिया था कि वो ‘तेग के धनी’ और शूरवीर योद्धा थे।
इस युद्ध में भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ बहुत समय तक लगातार युद्ध कर रहे थे। सिख इतिहास में आता है कि इस समय में ‘माता नानकी जी’ ने मां की ममता में आकर एक सिख को युद्ध के मैदान में भेजा और भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ को कहा गया कि आप बहुत समय से युद्ध कर रहे हो आप आयु में छोटे हो तो आप वापस आकर कुछ विश्राम कर लो और विश्राम के पश्चात फिर से युद्ध के मैदान में जाकर अपने जौहर दिखाना। कारण ‘युद्ध नीति’ के अनुसार इस युद्ध को समाप्त होने में लगभग 3 दिन का समय लगने वाला था।
इस युद्ध के मैदान में भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ ने एक योद्धा, निडर शूरवीर के रूप में बहुत ही कमाल का दृढ़ता से उत्तर दिया था। जिसे इतिहास में इस तरह से अंकित किया गया है–
हम शसत्र परति छत्री सधीर।
रण तियाग देनि ऐहु धरम नाहि।
गन रिपुंन हनहि हम जंग माहि।।
अर्थात् माता जी क्षत्रीय का धर्म नहीं है कि वह युद्ध के मैदान में से आराम करने के लिए वापस आ जाए। क्षत्रीय का धर्म समक्ष युद्ध करना है। जो सूरमा, योद्धा और बहादुर होते हैं वह युद्ध के मैदान से तब तक पुनः वापस नहीं आते हैं जब तक या तो युद्ध समाप्त ना हो जाए या युद्ध को जीता ना जाए।
करतारपुर का युद्ध सफलतापूर्वक जीता गया था। इस युद्ध के पश्चात गुरु ‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ ने हौसला अफजाई के लिए भावी गुरु ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ के लिए कमाल के आशीर्वाद वचन कहे थे। आप जी ने प्रेम पूर्वक वचन किए कि सचमुच आप ‘तेग के धनी’ हो, आपने अपने नाम के विशेषण अनुसार ‘तेग बहादुर’ के नाम को सारगर्भित करते हुए इस नाम कि आपने लाज रख ली।
इतिहास में यह भी जिक्र आता है कि पहले आपका नाम ‘त्याग मल’ था परंतु इस युद्ध के पश्चात ‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ ने अपने मुखारविंद से आपका नाम ‘ तेग बहादुर’ उच्चारित किया था।
करतारपुर के युद्ध के पश्चात ‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ अपने परिवार सहित किरतपुर नामक स्थान पर प्रस्थान कर गए थे।