उदासी संप्रदाय: उत्पत्ति, परंपरा और ऐतिहासिक विकास
(तप, त्याग और सिक्खी की सेवा का इतिहास)
उदासी संप्रदाय: उत्पत्ति, परंपरा और ऐतिहासिक विकास
(तप, त्याग और सिक्खी की सेवा का इतिहास)
बाबा श्रीचंद जी के समय समाज में अज्ञानता का व्यापक प्रभुत्व था। उन्होंने अपने तपस्वी और प्रभावशाली जीवन के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप में फैली विविध सांस्कृतिक धाराओं को शब्द के अंतर्गत समाहित किया और विभिन्न आध्यात्मिक अनुभूति–परंपराओं से संवाद स्थापित कर उन्हें गुरवाणी की दिव्य ज्योति से आलोकित किया। गुरमुखी लिपि के प्रचार – प्रसार, तख़्तों और गुरुद्वारों की सेवा – संभाल तथा मुगल साम्राज्य के कठिन काल में गुरु पंथ खालसा की रक्षा और सेवाएँ सभी उदासी संप्रदाय की इतिहास में अमूल्य देन हैं।
भूमिका
सिख चिंतन परंपरा में उदासी संप्रदाय को सिख धर्म का प्रथम संप्रदाय माना जाता है। इसका चिंतन शब्द से पोषण ग्रहण करता हुआ एक सुनिश्चित वैचारिक स्वरूप की ओर अग्रसर हुआ। गुरबाणी चिंतन, गुरबाणी व्याख्या, टीकाकारी तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बीड़ों को हस्तलिखित करने की परंपरा; इन सभी क्षेत्रों में उदासी संप्रदाय का योगदान ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय रहा है।
‘उदासी’ शब्द संस्कृत के उदासीन शब्द का तद्भव रूप है, जो ‘उद + आसीन’ के संयोग से बना है। ‘उद’ शब्द को सर्वोच्च मानते हुए पारब्रह्म के अर्थ में प्रयोग किया गया है, जबकि ‘आसीन’ का आशय स्थिति अथवा स्थान से है, अर्थात सर्वोत्तम और उच्चतम अवस्था। इस प्रकार ‘उदासी’ का तात्पर्य आत्मसंयमी साधु से है, वह मनुष्य जो सांसारिक मोह–माया से विरक्त और निर्लिप्त हो।
उदासी संप्रदाय की उत्पत्ति : वैचारिक धाराएँ
उदासी संप्रदाय की उत्पत्ति के विषय में दो प्रमुख विचारधाराएँ प्रचलित हैं। पहली विचारधारा के अनुसार, इस संप्रदाय के विद्वान साधु प्राचीन ग्रंथों में प्रयुक्त ‘उदासीन’ शब्द के आधार पर इसकी उत्पत्ति को परमात्मा से जोड़ते हैं। उनके अनुसार परमेश्वर से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई और ब्रह्मा के चार पुत्र: सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार, इस संप्रदाय के प्रवर्तक बने। आगे चलकर इस संप्रदाय की 165वीं कड़ी के रूप में बाबा श्रीचंद जी का अवतरण हुआ। इस प्रकार उदासी संप्रदाय को अनादि काल से प्रवाहित सिद्ध करने हेतु पौराणिक ग्रंथों और कथाओं का सहारा लिया जाता है।
दूसरी विचारधारा के अनुसार कुछ उदासी साधु श्री गुरु नानक देव साहिब जी को इस संप्रदाय का आदि आचार्य और संस्थापक मानते हैं। साधु संतरेण के अनुसार-
“आदि अचारय नानक देव निरंजन अंजन जाहि विलासी।
सिमि्त बेद पुराणक मारग जीव कटी भव फासी।
जीवन तारन कारन आपन आइ मही जु बिकुंठ निवासी।
ताहि नमामि सिरी गुरु को जिन पंथ करयो जग माहि उदासी॥”
(श्री मत नानक बिजै ग्रंथ, खंड 1, अध्याय 1, छंद 20)
श्री गुरु नानक देव साहिब जी की वाणी में ‘उदासी’ शब्द के प्रयोग से भी अनेक विद्वान यह निष्कर्ष निकालते हैं कि श्री गुरु नानक देव साहिब जी स्वयं उदासी भाव के प्रतीक थे। सिद्धों के साथ संवाद के समय उनसे प्रश्न किया गया—
“किसु कारणि गृिह तजिओ उदासी।
किसु कारणि इहु भेखु निवासी॥”
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 939)
इसके उत्तर में श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने वचन किए—
“गुरमुखि खोजत भए उदासी।
दरसन कै ताईं भेख निवासी॥”
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 939)
भाई गुरदास जी ने भी अपनी वारों में श्री गुरु नानक देव साहिब जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख करते हुए लिखा—
“बाबे भेख बणाइआ उदासी की रीति चलाई॥”
(भाई गुरदास, वार 1)
बाबा श्रीचंद जी का जीवन और साधना
अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश लोकमानस तक पहुँचाने के लिए श्री गुरु नानक देव साहिब जी के गृह में माता सुलखणी जी की कोख से सन् 1494 ईस्वी में सुल्तानपुर लोधी में बाबा श्रीचंद जी का जन्म हुआ। पिता से उन्होंने अक्षर–ज्ञान प्राप्त किया और बुआ नानकी जी से श्री गुरु नानक देव साहिब जी के जीवन की साखियों द्वारा जीवन–दृष्टि को आत्मसात किया। नाम – सिमरन बचपन से ही उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गया। उनकी देखरेख सेवक कमलिया जी किया करते थे, जो सदैव उनके साथ रहते। जहाँ भी बाबा श्रीचंद जी जाते, लोग उनकी वाणी को ध्यान पूर्वक सुनते और अनेक संशय दूर होते।
मौलवी नूरुद्दीन चुगत्ता के प्रश्न पर उन्होंने राम और रहीम की एकता और समरूपता का रहस्य समझाया। पंडित किशन दास को कर्ता और कृत्य की अभिन्नता का बोध कराया। नवाब दौलत खान को उन्होंने सत्य, क्षमा, वैराग्य, नम्रता, संतोष और परोपकार को धारण करने तथा तृष्णा, अहंकार, लोभ, नशा और अत्याचार जैसे विकारों के त्याग का उपदेश दिया।
उदासी यात्राएँ और प्रभाव
बाबा श्रीचंद जी ने गुरमत के प्रचार हेतु अपनी पहली यात्रा सन् 1524 ईस्वी में प्रारंभ की, उस समय उनकी आयु लगभग 30 वर्ष थी। उनके साथ बाल सखा भाई कमलिया जी भी थे। वे हरिद्वार, ऋषिकेश, उत्तर प्रदेश, मथुरा, आगरा, कानपुर, लखनऊ, अयोध्या होते हुए काशी पहुँचे। वहाँ से पटना, असम, बंगाल, उड़ीसा और कटक गए तथा कश्मीर, काबुल और पेशावर तक पहुँचे। जहाँ भी गए, ‘सतिनाम’ का प्रचार करते हुए लोगों को सत्य के मार्ग पर अग्रसर किया।
जब बादशाह हुमायूँ, शेरशाह सूरी से पराजित होकर लौट रहा था, तब वह बाबा श्रीचंद जी के दर्शन को आया और आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके फलस्वरूप तेरह वर्ष पश्चात् शेरशाह से युद्ध में विजय प्राप्त कर उसने अपना राज्य पुनः स्थापित किया।
सन् 1588 ईस्वी में हल्दी घाटी की पराजय के बाद महाराणा प्रताप भी बाबा श्रीचंद जी के दर्शनार्थ आए। बाबा जी ने उन्हें समझाया कि जीवन एक अखाड़ा है, हार और जीत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि आत्मा पराजित न हो, तो युद्ध अभी शेष है। इस उपदेश से महाराणा प्रताप को आत्मबल प्रबल हुआ और उन्होंने चित्तौड़ को छोड़कर शेष खोया हुआ प्रदेश पुनः प्राप्त कर लिया।
गुरु परंपरा से संबंध
श्री गुरु नानक देव साहिब जी के पश्चात भी बाबा श्रीचंद जी का गुरु साहिबानों के साथ निरंतर आत्मीय संबंध बना रहा। श्री गुरु अंगद देव साहिब जी ने अपने पुत्र दातू जी को बाबा श्रीचंद जी के पास भेजा, जो उनके शिष्य बने। श्री गुरु अमरदास साहिब जी ने अपने पुत्र बाबा मोहन जी के साथ से भेंट की और पाँच सौ रुपये और एक घोड़ा भेंट स्वरूप उन्हें दिया। श्री गुरु रामदास साहिब जी भी उनके दर्शन को आए और अपने पुत्र महादेव जी को सेवा में अर्पित किया। श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी भी समय – समय पर बाबा श्रीचंद जी से मिलने आते – जाते रहे।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी द्वारा संचित आध्यात्मिक तेज, तप और बल प्रताप को आपने बाबा गुरदित्ता जी को सौंपकर उन्हें विशेष रूप से अनुगृहीत किया। उस समय बाबा श्री चंद जी ने वचन किए- “मीरी – पीरी तो मेरे पास है, अब फकीरी भी तुम्हें सौंपता हूँ।” इस प्रकार उदासी का भेष बाबा गुरदित्ता जी को प्रदान कर उन्हें अपना प्रमुख शिष्य एवं उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
बाबा श्रीचंद जी गुरुमुखी, संस्कृत, फ़ारसी, संगीत और आयुर्वेद के गहन ज्ञाता थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में आरता, सहस्रनाम, गुरु गायत्री और मात्रा वाणी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आरता में श्री गुरु नानक देव साहिब जी की महिमा का गुणगान किया गया है। गुरु गायत्री और सहस्रनाम में गुरु पिता को अनेक नामों से स्मरण किया गया है। मात्रा वाणी में निर्गुण – सगुण, दुःख – सुख, भक्ति, सत्य और जीवन के वास्तविक उद्देश्य का सार प्रतिपादित है। बाबा श्रीचंद जी ने अपनी 149 वर्षों की दीर्घायु में देश – देशांतरों की व्यापक यात्राएँ कीं। जहाँ – जहाँ श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने संवाद रचे और संगतों की स्थापना की थी, उन स्थलों की पहचान कर उन्होंने निरंतर उन स्थलों की सेवा – संभाल की। अपने तपस्वी और प्रभावशाली जीवन के माध्यम से उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में फैली सांस्कृतिक धाराओं को शब्द के अंतर्गत समाहित किया और विभिन्न आध्यात्मिक अनुभूति, परंपराओं से संवाद स्थापित कर उन्हें गुरबाणी की दिव्य ज्योति से आलोकित किया।
श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की नीति और दृष्टि ने दो ऐतिहासिक कार्य सिद्ध किए। प्रथम: जब गुरु पंथ कठिन और संकटपूर्ण समय से घिरा था, तब सिक्खी के साहित्यिक आदर्शों और मूल्यों के दूर – दराज़ क्षेत्रों में प्रचार – प्रसार का दायित्व उदासी संतों ने संभाला। द्वितीय: उदासी संप्रदाय का संस्थागत स्वरूप चार धूणियों और छह बख़्शिशों के माध्यम से सुव्यवस्थित रूप में विकसित हुआ, जिसका विवरण इस प्रकार है—
चार धूणियाँ
1. अलमस्त जी
अलमस्त जी का जन्म संवत् 1610 विक्रमी में श्रीनगर में, माता प्रभा की कोख से और पिता भाई हरदित्त कौल के गृह में हुआ। उन्होंने बाबा श्रीचंद जी की शरण ग्रहण की, बाबा श्रीचंद जी ने उनका नाम ‘अलमस्त’ रखा। ‘नानक मते’ की सेवा–संभाल हेतु उन्हें प्रमुख नियुक्त किया गया। इस धूणी की देखरेख में बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, पाकिस्तान, मुल्तान और सिंध आदि क्षेत्रों में अनेक डेरों की स्थापना हुई। इस धूणी के महंत पीढ़ी – दर – पीढ़ी अलमस्त जी की परंपरा से संबंधित माने जाते हैं।
2. बालू हसना जी
बालू हसना जी, अलमस्त जी के छोटे भ्राता थे। उनका जन्म संवत् 1621 विक्रमी में हुआ; बाल्यकाल में उनका नाम बालकृष्ण था। वे अलमस्त जी के साथ ही बाबा श्रीचंद जी की सेवा में आए और आगे चलकर बाबा गुरदित्ता जी की सेवा में तत्पर रहे। ईश्वरीय प्रेम में रमे और सदा प्रसन्नचित्त रहने के कारण उनका नाम ‘बालू हसना’ पड़ गया। उन्हें पश्चिमी पंजाब का क्षेत्र सौंपा गया और डेरा बाबा नानक उनका प्रमुख केंद्र बना। महाकवि संतरेण इसी परंपरा के उदासी महंत थे। इस परंपरा का विस्तार सर्वाधिक हुआ।
3. गोइंद साहिब जी
संवत् 1626 विक्रमी में कश्मीर में लाला जयदेव दास के गृह में उनका जन्म हुआ। वे बाबा श्रीचंद जी और बाबा गुरदित्ता जी की सेवा में रहे। गुरमत के प्रचार हेतु उन्हें दक्षिण भारत भेजा गया। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने पंजाब में धर्म–प्रचार किया और फिल्लौर में उनका देहांत हुआ। अमृतसर का संगलावाला अखाड़ा उनका प्रमुख केंद्र था।
4. फुल साहिब
फुल साहिब, गोइंद साहिब जी के छोटे भ्राता थे। उनका जन्म संवत् 1630 विक्रमी में हुआ। बड़े भ्राता के साथ ही उन्होंने बाबा जी की शरण ग्रहण की और सेवा – सिमरन की कठोर साधना द्वारा चौथे धूणे के प्रमुख नियुक्त हुए। होशियारपुर ज़िले का नगर बहादुरपुर उनका मुख्य केंद्र बना। बाबा चरण शाह उनके प्रसिद्ध सेवक थे।
छह बख़्शिशें
गुरु साहिबानों ने गुरमत के प्रचार हेतु कुछ तपस्वी साधकों को विशेष अनुग्रह प्रदान कर विभिन्न क्षेत्रों में नियुक्त किया। उदासी संप्रदाय की छह बख़्शिशें प्रसिद्ध हैं। चार धूणियों और छह बख़्शिशों को मिलाकर इस संप्रदाय के साधुओं को दसनामी साधु भी कहा जाता है।
1. सुथरे शाहिये
इस बख़्शिश के संचालक सुथरे शाह थे। कश्मीर के बारामूला के समीप ब्रामपुर गाँव में नंदे शाह खत्री के घर एक बालक जन्मा, जिसके मुख में दाँत देखकर माता–पिता ने उसे अपशकुन मानकर निर्जन स्थान पर छोड़ दिया। उधर से गुजरते हुए श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने बालक का रुदन सुना और सेवकों से कहा—“कितना सुथरा बालक है; इसे उठा कर पालन–पोषण की व्यवस्था करो।” गुरुजी के मुख से निकले ‘सुथरा’ शब्द के कारण बालक का नाम सुथरा पड़ गया। वह गुरु–घर का महान प्रेमी बना और श्री गुरु हरिराय साहिब जी की सेवा में भी रहा। पंजाब, कश्मीर और बल्ख–बुखारा तक उसने सिक्खी का प्रचार किया।
2. संगत साहिबिए
इस बख़्शिश के संचालक भाई फेरू थे। उन्हें श्री गुरु हरिराय साहिब जी और श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी की विशेष कृपा प्राप्त थी। बाल्यकाल में उनका नाम संगत था और वे फेरी लगाते थे। श्री गुरु हरिराय साहिब जी के सेवक बनकर उन्हें नक्के का मसंद नियुक्त किया गया। फेरी लगाने के कारण वे ‘फेरू’ नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने नाम, वाणी और लंगर की परंपरा को प्रेमपूर्वक निरंतर चलाया। मसंदों के दुराचार – सुधार के समय उन्हें भी दरबार में उपस्थित होने का आदेश हुआ। वे अपनी दाढ़ी हाथ में लेकर विनम्रतापूर्वक दशम गुरु के समक्ष उपस्थित हुए। उनकी सेवा और नाम–साधना से प्रसन्न होकर उन्हें ‘संगत साहिब: सच्ची दाढ़ी’ की उपाधि प्रदान की गई।
3. भगत भगवानीए
ये गिरि संप्रदाय के संन्यासी महात्मा तथा हिंगलाज देवी के उपासक थे। बोधगया से दर्शन – यात्रा पर निकलते हुए पंजाब पहुँचे, जहाँ गुरु–महिमा सुनकर श्री गुरु हरिराय साहिब जी के दर्शन किए और उनके सेवक बन गए। बाबा धर्मचंद जी के पुत्र मिहर चंद की संगत में उन्होंने उदासी भेष धारण किया और पूर्वी भारत में गुरमत–प्रचार हेतु भेजे गए। इस बख़्शिश के अंतर्गत पूर्व में 370 डेरों की स्थापना हुई।
4. मीहां साहिबिए
ये श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के निष्ठावान सिख थे और उन्हें गुरुजी से विशेष अनुग्रह प्राप्त था। बाबा स्वरूप दास भल्ला के अनुसार, उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर गुरुजी ने एक प्राचीन दक्षिणी बैल, नगाड़े सहित गुरु–शब्द का निशान प्रदान किया। गुरु चरण स्पर्श से पावन एक खड़ाऊँ भी उन्होंने आशीर्वाद (तबर्रुक) के स्वरूप माँगी। महंत गणेशा सिंह ‘भारत मत दर्पण’ में बख़्शिशों के अंतर्गत उनके चोले, सेली टोपी और लोहे का भी उल्लेख करते हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने प्रसन्न होकर उन्हें एक सिरी साहिब (कृपाण) तथा अपनी दस्तार का आधा भाग प्रदान किया और ‘मीहां साहिब’ की उपाधि दी।
5. बख़्त मलिए
इस बख़्शिश के प्रमुख भाई बख़्त मल जी थे। श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के समय से वे काबुल क्षेत्र में गुरमत प्रचार और गुरु घर के लिए उगाही के कार्य में नियुक्त थे। भाई कन्हैया सिंह नाभा के अनुसार, मसंद सुधार के समय श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने उन्हें क्षमा प्रदान की।
6. जीत मलिए
बीबी वीरो के पाँच पुत्रों में से जीत मल इस बख़्शिश के संचालक थे। श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के समय वे मसंद रहे और जीवन के अंतिम समय तक गुरमत का प्रचार करते रहे। इस बख़्शिश के साधुओं को उदासी संप्रदाय में ‘जीत मलिए’ कहा जाता है।
इन बख़्शिशों के अतिरिक्त, संप्रदाय के विकास हेतु दस उप–बख़्शिशें भी अस्तित्व में आईं—
- माणक चंद और मिहर चंद,
- सोढ़ी धीर मल
- निरंजन राय
- दीवाना साहिब
- कन्हैया साहिब
- सेवा दास,
- रामदासिए
- जिग्यासी राम निरबाण
- राम राय
- थान दास
इन छह बख़्शिशों और दस उप-बख़्शिशों ने पीढ़ी – दर – पीढ़ी उदासी संप्रदाय के मूल सिद्धांतों का प्रचार – प्रसार किया। डॉ. बलबीर सिंह ने ‘निरुक्त श्री गुरु ग्रंथ साहिब’ में इनके आश्रमों की संख्या तथा प्रमुख केंद्रों का विवरण इस प्रकार दिया है— आश्रमों की संख्या: बालू हसना—403, अलमस्त—176, फूल साहिब—86, मीहां साहिब—232, भगत भगवानीए—383, सुथरे शाही—8, दीवाना साहिब—20।
मुख्य केंद्र: ब्रह्म बूटा अखाड़ा, संगल वाला अखाड़ा (अमृतसर), डेरा बाबा जौड़ियों वाला फेरूमल (ब्यास), राणो पाली (अयोध्या), वेद मंदिर (अहमदाबाद), बड़ा अखाड़ा (इलाहाबाद), बड़ा अखाड़ा, नया अखाड़ा, गुरु मंडल, गंगेश्वरधाम (हरिद्वार), बहादुरपुर (होशियारपुर), दरबार बाबा राम राय साहिब (देहरादून), हरिहर धाम (दिल्ली), साधू बेला (बनारस, बंबई), बाग़ बाबा हज़ारा (लखनऊ) आदि। उदासी साधुओं के प्रचार के सदक़े गुरबाणी और सिख धर्म पंजाब तथा पंजाब से बाहर भारत में दूर – दूर तक फैला। धर्म का प्रचार – प्रसार उन्होंने केवल गुरुवाणी द्वारा ही नहीं, बल्कि लेखन के माध्यम से भी कर गुरुघर की अपार सेवाए की। इन साधुओं ने गुरमुखी लिपि और पंजाबी भाषा के प्रसार – प्रसार में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के श्रद्धालु उदासी साधु बाबा गुरदास दखणी जी ने गुरु जी के आदेशानुसार लाहौर में गुरमुखी का प्रचार किया। सेवापंथी भाई अड्डण शाह इनके शिष्य थे। सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं के अभाव के समय में इन साधुओं ने गाँवों, शहरों में लोगों को गुरमुखी सिखाकर शुद्ध बाणी पढ़ने की शिक्षा दी। इस क्षेत्र में जहाँ सुथरा जी, भाई फेरू, बख़्त मल, लाल दास दरियाई, जादो राय, बाबा दयाल दास अनेमी, संत रेण तथा टहिल दास उदासी जैसे कवि थे, वहाँ साधु आनंदघन और साधु सदानंद जैसे गुरबाणी के टीकाकार भी प्रसिद्ध हुए। इसके अतिरिक्त गुरमत सिद्धांतों को लेखन में उजागर करने में रतन हरि उदासी, अमीर दास, शिव राम चक्रवर्ती और बाबा बिशन दास उदासी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उदासी महापुरुषों ने सिख गुरु साहिबानों और सिख धर्म की अत्यंत निष्काम सेवा की। संत कृपाल दास ने भंगाणी के युद्ध में हयात ख़ाँ का वध किया। साधु गुरबख़्श राय ने ‘सीस गंज’ साहिब दिल्ली तथा तख़्त केेसगढ़ की सेवा की। महंत ईश्वर दास ने सचखंड नांदेड़ में अनेक ख़तरे सहते हुए अठारह वर्ष तक सेवा निभाई। उनके पश्चात गोपाल दास और गुरशरण दास उदासी ने इस स्थान की सेवा का निर्वाह किया। जब ख़ालसा अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखने हेतु मुगल साम्राज्य से जूझ रहा था, सिखों के सिरों के दाम लगाए जा रहे थे, खुलेआम उनकी हत्या की जा रही थी, तब वे जंगलों और पहाड़ों में जाकर शरण लेने को विवश हुए और पुनः संगठित होने के प्रयत्न करने लगे। ऐसे समय उदासी साधु प्रीतम दास निरबाण और साधु संतोक दास जी ने रावी से श्री दरबार साहिब, अमृतसर तक हंसली लाने का शुभ कार्य अत्यंत प्रेम और सेवा-भाव से संपन्न किया; (“हंसली” यहाँ गुरुघर के सौंदर्य, सम्मान और परंपरा से जुड़ी एक पवित्र धातु-कला (sacred metal ornament / structure) है, जिसे लाने का कार्य स्वयं में महान सेवा (सेवा-कर्म) माना गया; जो इतिहास में एक महान देन के रूप में स्मरणीय है। मिसलों के काल में सिख सरदारों तथा शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह द्वारा खुले हृदय से जागीरें प्रदान की गईं, जो इस संप्रदाय के विकास में सहायक सिद्ध हुईं।
विकास परंपरा का अगला चरण उदासी संप्रदाय की देश-देशांतरों में स्थापित विविध पद्धतियों के केंद्रों के बीच तालमेल हेतु एक साझा केंद्र की स्थापना था। महंत प्रीतम दास जी निरबाण ने इन विभिन्न पद्धतियों को एक सूत्र में पिरोने का संकल्प उठाया। उन्होंने तत्कालीन प्रमुख महंतों को एकत्र कर, परस्पर विचार – विमर्श के उपरांत ‘उदासीन पंचायती अखाड़ा’ नामक संस्था की स्थापना की, जिसका मुख्य केंद्र ‘प्रयाग’ बनाया गया। इस संस्था ने उदासी डेरों की संपत्ति की सुरक्षा, यात्रियों और साधुओं के निवास, लंगर के प्रबंध, बड़े – बड़े समागमों की व्यवस्था, अखाड़ों से भिन्न डेरों में महंत नियुक्त करने का कार्य तथा उनकी निगरानी की जिम्मेदारी संभाली। 1896 विक्रमी संवत से गुरु संगत साहिब से संबंधित महंत संतोक दास आदि के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसके परिणामस्वरूप ‘उदासीन पंचायती नया अखाड़ा’ अस्तित्व में आया। इस संस्था में भी अनेक उदासी अखाड़े और डेरे सम्मिलित हैं।
उदासियों का गुरु पंथ खालसा को अमूल्य योगदान
उदासी परंपरा का सिख पंथ में अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उदासी साधु संगत को गुरमुखी अक्षरों का बोध कराते हुए, श्री गुरु नानक साहिब जी की देश-देशांतर यात्राओं से जुड़ी स्मृतियों और स्थलों की देख-रेख का दायित्व निभाते रहे। वे नामदान का उपदेश देते थे और आयुर्वेदिक व आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होने के कारण मन के साथ-साथ शरीर के रोगों का भी निवारण करते थे। उदासियों के प्रचार-प्रसार के केंद्रों को अखाड़े कहा जाता है। उदासी साधु प्रायः इन अखाड़ों में निवास करते थे और उनमें से अनेक भ्रमणशील भी होते थे। उनका परिधान गेरुआ होता था; सिर पर दस्तार या सेली टोपी धारण करते थे। कुछ संग वाले उदासी साधु कमर पर जंजीर भी पहनते थे। वे लंगोट या चादर ओढ़ते, हाथ में बैरागण और कंभर (लोटा) रखते थे। उनका जीवन सिमरन और त्याग में व्यतीत होता था तथा उनका गुरुमंत्र “सतिनाम” था।
जिन स्थानों को धूणे कहा जाता है, उन्हें सुशोभित करने का कार्य बाबा गुरदित्ता जी ने किया। उन्होंने चार प्रमुख केंद्र स्थापित किए, जिनकी देख-रेख का दायित्व बालू हसन, गोंदा, अलमस्त और फूल जी को सौंपा। सिख परंपरा में जोत और जुगत, यह दो महान सिद्धांत माने जाते हैं। यदि जोत गुरु-गद्दी में प्रतिष्ठित रही, तो जुगत उदासियों के माध्यम से प्रवाहित हुई। अठारहवीं शताब्दी के कठिन और संकटपूर्ण समय में जैसा कि प्रसिद्ध लेखक जसवंत सिंह नेकी ने अपने लेख “जोत और जुगत” (सदा विगास) में उल्लेख किया है कि- उदासियों ने ही सिख परंपरा को जीवित और सक्रिय बनाए रखा। गुरबाणी और गुरमुखी लिपि की शिक्षा को निरंतर जीवंत रखा गया। मुगल काल में सिखों के निरंतर संहार के बावजूद, सिख परंपरा की अखंड कड़ी बनी रही, यह भी उदासियों के अथक प्रयासों का ही परिणाम था। हरिमंदर साहिब तथा अन्य पवित्र स्थलों पर निरंतर ज्योति प्रज्वलित रखने का दायित्व भी उन्होंने निभाया। बाकू, ताशकंद और ईरान में स्थित प्राचीन धर्मशालाएँ आज पुरातात्विक खुदाइयों के दौरान पुनः प्रकाश में आ रही हैं, यह सब उदासियों के दृढ़ संकल्प और सेवाभाव का प्रमाण है। वह कुंभ तथा भारत के अन्य प्रसिद्ध मेलों में जाकर “सतिनाम” का प्रचार करते रहे। यद्यपि सिख परंपरा में मीणे, रामरईये, धीरमल्लिये और निरंकारी जैसी अन्य धाराएँ भी उभरीं, जो आगे चलकर स्वतंत्र पहचान बनाकर मुख्यधारा से दूर हो गईं, किंतु उदासियों ने सदैव सिक्खी का पूर्ण सहयोग प्रदान किया।
सिक्खी को रूप और कला प्रदान करने में भी उदासियों का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों के पश्चात जब हरिमंदर साहिब के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ हुआ, तब उसकी स्थापत्य रूपरेखा और कलात्मक सौंदर्य के विकास में उदासियों की प्रमुख भूमिका रही। आगे चलकर शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के काल में, जब सरोवरों को जल से परिपूर्ण रखने की आवश्यकता पड़ी, तब बाबा संतोक दास उदासी ने माधोपुर के निकट दोआबे के सरदारों को प्रेरित कर एक हंसली (नहर) की सेवा करवाई, जिससे सरोवर वर्ष भर जल से भरा रहता था। गुरमुखी विद्या के संरक्षण और ‘ज्ञानी’ तैयार करने में भी उदासियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वामी आनंदघन जी ने नानक बाणी पर टीका लिखा, जो गुरबाणी की व्याख्या परंपरा में एक विशिष्ट और अनूठा अध्याय है। बाबा श्रीचंद जी ने स्वयं मातृ साहिब की रचना की और उदासी भेष व विश्वास की व्याख्या प्रस्तुत की। स्वामी ब्रह्मदेव जी ने मातृ साहिब की आध्यात्मिक व्याख्या कर उसी उदासी व्याख्यात्मक परंपरा को आगे बढ़ाया।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में सिख समाज में सुधारवादी और शुद्धतावादी आंदोलनों के प्रभाव से उदासियों तथा अन्य प्राचीन परंपराओं को संदेह और उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाने लगा। परिणामस्वरूप उनसे गुरुद्वारों का प्रबंधन छीन लिया गया और उनकी पूजा – पद्धतियों को अस्वीकार कर दिया गया। इतना ही नहीं, गुरु पंथ के अंग के रूप में उन्हें पर्याप्त मान्यता भी नहीं मिली, जिसके कारण वह सनातन परंपरा की ओर प्रविष्ट होने को विवश हुए।
आज आवश्यकता इस ऐतिहासिक उपेक्षा को दूर करने की है। सभी नानक पंथी धाराओं- उदासी, निर्मले, सेवापंथी और निहंगों को एकत्र होकर सिक्खी को पुनः सशक्त और जीवंत बनाने तथा “सतिनाम” के प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है।
गुरुवाणी में अंकित है-
“होइ इकत्र मिलहु मेरे भाई दुबिधा दूरि करहु लिव लाइ॥”
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1185)
आज के दौर में गुरु पंथ खालसा की सामाजिक रूप से उलझी हुई स्थिति के कारण उदासी संप्रदाय को अपेक्षित और सार्थक समर्थन नहीं मिल पाया। परिणामस्वरूप इसकी आध्यात्मिक एक सुरता, ऐतिहासिक संतुलन, ज्ञान और शब्द में उजागर होने वाला विश्वव्यापी आध्यात्मिक भाईचारा पूर्ण रूप से प्रकट नहीं हो सका। बाबा श्रीचंद जी की सेवा, मानव के कल्याण, तप, त्याग और कुर्बानी को सदा के लिए संसार में प्रकाश-स्तंभ की भांति मार्गदर्शन करती रहेगी।
आभार-
यह आलेख “उदासी संप्रदाय: उत्पत्ति, परंपरा और ऐतिहासिक विकास” जिन वैचारिक आधारों, प्रामाणिक तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों पर निर्मित हुआ है, उनके लिए मैं आदरपूर्वक दो गंभीर एवं समर्पित शोधकर्ताओं—जसकीत सिंह [email protected] तथा दिलशेर सिंह— [email protected] का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। जसकीत सिंह, गुरु गोबिंद सिंह धर्म अध्ययन विभाग, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला के पी.एच.डी. के विद्वान होने के साथ – साथ उदासी संप्रदाय पर दीर्घकालिक, स्थलीय और साधु – संगत आधारित शोध के माध्यम से इस उपेक्षित परंपरा को अकादमिक गरिमा प्रदान करते हैं। उनकी गुरमुखी कृति “उदासी संप्रदाय: उत्तपत्ती ते विकास” (पुस्तक: भूले बिसरे नानक पंथी) ने उदासी परंपरा की उत्पत्ति, संस्थागत संरचना और ऐतिहासिक प्रवाह को गहनता और प्रमाणिकता के साथ उद्घाटित किया है। वहीं, दिलशेर सिंह—पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला के शोधार्थी, विद्वान तथा गुरु पंथ खालसा के भविष्य पर गंभीर दृष्टि रखने वाले चिंतक की गुरमुखी रचना “उदासीआं दी सिख पंथ नुं वडमुली देन” (पुस्तक: भूले बिसरे नानक पंथी) ने उदासी संप्रदाय की गुरु पंथ खालसा को दी गई बहुआयामी सेवाओं, सांस्कृतिक योगदान और ऐतिहासिक संरक्षण की भूमिका को सशक्त रूप में रेखांकित करती है। इन दोनों विद्वानों की शोधपरक दृष्टि, वैचारिक स्पष्टता और ऐतिहासिक निष्ठा से प्राप्त प्रेरणा एवं सामग्री के बिना यह लेख अपने वर्तमान स्वरूप में संभव न होता। अतः मैं दोनों लेखकों के प्रति गहन कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ और आशा करता हूँ कि उनका यह श्रम सिख इतिहास के अध्ययन में नई दिशाएँ प्रशस्त करता रहेगा।
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’


